छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले की समाजसेवी डॉ. बुधरी ताती को पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया जाएगा। कठिन हालात, दुर्गम बीहड़ों में पैदल सफर और जानलेवा खतरे के बावजूद उन्होंने साहस और जज़्बे के साथ काम किया और 500 से अधिक महिलाओं को जागरूक किया। भारत सरकार इसी काम और समर्पण को देखते हुए उन्हें देश के प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान से नवाज रही है। बुधरी ताती गीदम ब्लॉक के हिरानार गांव की निवासी हैं। साल 1984-85 में उन्हें गुरमगुंडा आश्रम के लखमू बाबा से समाज सेवा की प्रेरणा मिली। उस समय उनकी उम्र लगभग 15 साल थी। उन्होंने ठान लिया कि उनका जीवन सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए समर्पित होगा। परिवार को समझाने के बाद वे नागपुर स्थित अखिल भारतीय राष्ट्रीय सेवा समिति पहुंचीं। यहां उन्होंने 3-4 महीने का प्रशिक्षण लिया और अनुभव हासिल किया। इसके बाद वे रायपुर होते हुए बस्तर पहुंचीं। उस दौर में आदिवासी इलाकों में महिलाओं का घर से बाहर निकलना भी आसान नहीं था, फिर भी एक लड़की ने सामाजिक कुरीतियों, अशिक्षा और अंधविश्वास के खिलाफ संघर्ष का रास्ता चुना। डॉ. बुधरी ताती के अलावा डॉ. रामचंद्र गोडबोले और सुनीता गोडबोले को भी पद्मश्री सम्मान से नवाजा जाएगा। यह दंपती पिछले 35 साल से आदिवासी इलाकों में निःशुल्क स्वास्थ्य सेवाएं दे रहे हैं। मूल रूप से महाराष्ट्र के सतारा जिले के रहने वाले ये डॉक्टर 1990 में बारसूर (दंतेवाड़ा) आकर बस गए। 545 गांवों तक पैदल सफर, 40 साल की सेवा डॉ. बुधरी ताती ने अपने जीवन के 40 साल बस्तर के अंदरूनी इलाकों में समाज सेवा को समर्पित किए। वे अब तक 545 से अधिक गांवों में पैदल पहुंचीं और वहां की महिलाओं को जागरूक किया। उन्होंने 500 से अधिक महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया। किसी को सिलाई-कढ़ाई से जोड़ा, तो किसी को अन्य स्वरोजगार के साधनों से। उनका मानना है कि जब तक महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त नहीं होंगी, तब तक समाज मजबूत नहीं बन सकता। शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण पर विशेष जोर बुधरी ताती का कार्य केवल महिला सशक्तिकरण तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों पर भी गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक किया। अंदरूनी इलाकों में स्वच्छता, पोषण, मातृ-शिशु स्वास्थ्य और बीमारियों से बचाव की जानकारी दी। कई गांवों में नशाखोरी के खिलाफ अभियान चलाया, जिसके चलते अनेक लोगों ने नशा छोड़कर नई जिंदगी शुरू की। समाज सेवा के लिए नहीं की शादी डॉ. बुधरी ताती के जीवन का सबसे बड़ा त्याग यह रहा कि उन्होंने समाज सेवा के लिए विवाह नहीं किया। उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज के नाम कर दिया। गांव की हर महिला उन्हें बेटी जैसी लगती है, हर बच्चा अपना और हर बुजुर्ग परिवार का सदस्य। यही कारण है कि बस्तर के ग्रामीण उन्हें कभी ‘बुआ’ तो कभी ‘बड़ी दीदी’ कहकर बुलाते हैं। जानलेवा हमले भी नहीं तोड़ सके हौसला समाज में बदलाव की राह आसान नहीं रही। बुधरी ताती को अपने कार्य के दौरान कई बार विरोध और हिंसा का सामना करना पड़ा। उनका कहना है कि एक समय ऐसा भी आया जब अबूझमाड़ के एक गांव में गई थी। यहां ग्रामीणों ने धारदार हथियारों के साथ उन्हें दौड़ा लिया। हालात इतने गंभीर थे कि उनकी जान पर बन आई। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने पीछे हटने का फैसला नहीं किया। वे कहती हैं, ‘अगर डर जाती, तो आज भी महिलाएं अंधेरे में होतीं।’ यही सोच उन्हें आगे बढ़ाती रही। वृद्धाश्रम और अनाथ बच्चों की जिम्मेदारी समाज सेवा की इस यात्रा में हिरानार में उन्होंने वृद्धाश्रम की स्थापना की। जहां बेसहारा बुजुर्गों को सम्मान और सहारा मिल रहा है। इसके साथ ही वे अनाथ और गरीब आदिवासी बच्चों की शिक्षा, रहन-सहन और भविष्य की जिम्मेदारी भी निभा रही हैं। इस सेवा कार्य में उनकी भतीजी अन्ति वेक भी सहयोग कर रही हैं। पद्मश्री सम्मान- 40 साल की तपस्या का परिणाम डॉ. बुधरी ताती को मिलने वाला पद्मश्री सम्मान सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे बस्तर की संघर्षशील महिलाओं की जीत है। यह उनकी 40 वर्षों की निस्वार्थ सेवा, साहस और समर्पण का प्रतीक है। 55 साल की उम्र में भी वे उतनी ही सक्रिय हैं, जितनी युवावस्था में थीं। उनका कहना है कि जब तक शरीर साथ देगा, वे समाज के लिए काम करती रहेंगी। अब तक मिल चुके हैं 22 पुरस्कार डॉ. बुधरी ताती ने बताया कि अब तक उन्हें कुल 22 पुरस्कार मिल चुके हैं, जिनमें 3 राष्ट्रीय स्तर के सम्मान शामिल हैं। पद्मश्री सम्मान उनकी सेवा यात्रा का 23वां और सबसे प्रतिष्ठित सम्मान होगा। बस्तर के लिए गर्व का क्षण डॉ. बुधरी ताती का पद्मश्री से सम्मानित होना केवल दंतेवाड़ा ही नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गर्व की बात है। यह साबित करता है कि सच्ची नीयत और मजबूत इरादों से किसी भी कठिन रास्ते पर बदलाव संभव है। बस्तर की इस ‘बेटी’ ने दिखा दिया कि समाज सेवा सिर्फ काम नहीं, बल्कि एक तपस्या है और अब उसी तपस्या को देश ने सलाम किया है। बस्तर के ‘डॉक्टर भैया’ और ‘भाभी’ को भी पद्मश्री डॉ. रामचंद्र गोडबोले और उनकी पत्नी सुनीता गोडबोले MAAS योजना के तहत बच्चों को कुपोषण और एनीमिया से बचाने का काम कर रहे हैं। इसके साथ ही दूर-दराज के गांवों में मेडिकल कैंप लगाते हैं। लगातार फॉलो-अप करते हैं। मेरे सामने बैठा हर आदिवासी मेरे लिए भगवान- डॉ. रामचंद्र डॉ. रामचंद्र जिन्हें लोग प्यार से “डॉक्टर भैया” कहते हैं, अब तक 1 लाख से ज्यादा मरीजों का इलाज कर चुके हैं। वहीं सुनीता गोडबोले आदिवासी महिलाओं के संगठन और स्वास्थ्य जागरूकता में सक्रिय रूप से काम कर रही हैं। साथ ही स्कूल के बच्चों को स्वास्थ्य शिक्षा और संस्कार भी देते हैं। डॉ. गोडबोले का कहना है कि मेरे सामने बैठा हर आदिवासी मेरे लिए भगवान है। ……………………………. यह खबर भी पढ़ें… छत्तीसगढ़ की बुधरी, डॉ. रामचंद्र-सुनीता को पद्मश्री: ताती ने 545 गांवों की महिलाओं को जागरूक किया, डॉक्टर-दंपती 1 लाख मरीजों का कर चुके फ्री इलाज केंद्र सरकार ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर रविवार को 2026 के लिए 131 पद्म पुरस्कारों का ऐलान किया। इनमें 5 पद्म विभूषण, 13 पद्म भूषण और 113 पद्मश्री शामिल हैं। इनमें छत्तीसगढ़ के डॉक्टर रामचंद्र गोडबोले और सुनीता गोडबोले के साथ बुधरी ताती पद्मश्री सम्मान से नवाजी जाएंगी। पढ़ें पूरी खबर
Discover more from India News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.