साइबर ठगों ने दैनिक भास्कर को बताया ऑनलाइन ठगी का कैसे चलता करोबार।
यह कबूलनामा साइबर ठग का है, जो महादेव गेमिंग-बेटिंग जैसे ऑनलाइन सट्टा नेटवर्क से जुड़ा रहा है। मोबाइल पर खेले जाने वाले तीन पत्ती और लूडो किंग जैसे गेम्स मनोरंजन लगते हैं, लेकिन इनके पीछे करोड़ों की साइबर ठगी का नेटवर्क काम कर रहा है। इस नेटवर्क की सबसे मजबूत कड़ी हैं वे बैंक अकाउंट, जो 10 से 15 हजार रुपए में खरीदे जाते हैं।
ठगों के मुताबिक, गांव-देहात के जरूरतमंद लोग खुद अपना अकाउंट दे देते हैं, वही हमारे लिए सबसे सेफ होता है। ऐसे लोगों के नाम पर नया बैंक अकाउंट, एटीएम कार्ड और सिम कार्ड एक्टिव कराया जाता है। बदले में उन्हें मामूली रकम मिलती है, लेकिन इन्हीं अकाउंट्स से ठगी का पैसा देश-विदेश में घुमाया जाता है। पूरा सिस्टम दुबई से कंट्रोल होता है। भारत में मीडिएटर और थर्ड पर्सन सिर्फ मोहरे हैं। साइबर ठग के अनुसार – भारत में कुछ भी अपने आप नहीं होता, हर अकाउंट और हर ट्रांजेक्शन पर दुबई से नजर रखी जाती है।
बता दें कि हाल ही में उमरी थाना पुलिस ने ऑनलाइन गेमिंग और तत्काल लोन का झांसा देकर साइबर ठगी करने वाले अंतरराज्यीय गिरोह का खुलासा करते हुए पांच आरोपियों को गिरफ्तार भी किया था। दैनिक भास्कर की पड़ताल में पहली बार कैमरे पर आए ठगों ने बताया कि कैसे भरोसा, लालच और तकनीक के सहारे आम लोगों को ठगी के जाल में फंसाया जा रहा है। पढ़िए रिपोर्ट…
लालच, तकनीक और विदेश से कंट्रोल-ऐसे चलता है साइबर ठगी का नेटवर्क
लालच देकर फंसाते हैं लोग
साइबर ठगों ने बताया कि ठगी की शुरुआत सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर दिखने वाले आकर्षक विज्ञापनों से होती है। इनमें बड़े मुनाफे का लालच देकर कस्टमर को ऑनलाइन गेम या सट्टे की ओर खींचा जाता है। शुरुआत में भरोसा जीतने के लिए खिलाड़ी को हजारों के दांव पर दो से तीन लाख रुपए तक जितवा दिया जाता है।
जैसे ही उसका भरोसा मजबूत होता है और वह लाखों रुपए लगाने लगता है, वहीं से ठगी का असली खेल शुरू होता है। गेम में जीत के बाद जब कस्टमर वॉलेट से अपने बैंक खाते में पैसा ट्रांसफर करता है, उसी वक्त वॉलेट को हैंग कर दिया जाता है। रकम ट्रांसफर के लिए करीब 30 सेकंड का समय दिया जाता है। इसी दौरान दुबई में बैठे गिरोह के सदस्य फर्जी बैंक खातों में पूरी रकम ट्रांसफर कर लेते हैं।
चार प्वाइंट में समझिए, ठगी का पूरा जाल कैसे काम करता है
- एजेंट (थर्ड पर्सन) की भूमिका : सबसे पहले एजेंट जरूरतमंद, बेरोजगार या गरीब लोगों को आसान कमाई का लालच देता है। उनके नाम से बैंक अकाउंट खुलवाता है, आधार-पैन जैसे दस्तावेज लेता है और अकाउंट में नया मोबाइल नंबर एक्टिव कराता है। इसके बाद अकाउंट का पूरा कंट्रोल मीडिएटर को सौंप दिया जाता है।
- मीडिएटर (सुपरवाइजर) का काम : मीडिएटर एक साथ कई अकाउंट संभालता है। ठगी से आया पैसा किसी एक अकाउंट में न रखकर उसे अलग-अलग अकाउंट में घुमाता रहता है, ताकि शिकायत होने पर जांच उलझ जाए। वह रकम का करीब 10% कमीशन अपने पास रखता है और बाकी पैसा आगे ट्रांसफर कर देता है।
- चैकर्स की भूमिका : चैकर्स मीडिएटर पर निगरानी रखते हैं। उनकी जिम्मेदारी होती है कि किसी एक अकाउंट में ज्यादा पैसा न रुके। आमतौर पर 10 लाख रुपए की सीमा पूरी होते ही रकम सुरक्षित तरीके से आगे भेज दी जाती है।
- कंपनी का कंट्रोल (एमडी और टीम) : पूरे सिस्टम पर कंपनी के एमडी या उनकी भरोसेमंद टीम की सीधी नजर रहती है। मकसद यह होता है कि चैकर्स और मीडिएटर आपस में मिलकर गड़बड़ी न कर सकें। इसी सख्त निगरानी में पूरा ठगी का नेटवर्क चलता है।

साइबर ठगों से बातचीत के दौरान उन्होंने कई खुलासे किए।
दुबई से ऑपरेट होता है पूरा नेटवर्क
ऑनलाइन सट्टा और गेमिंग ठगी का पूरा नेटवर्क दुबई से संचालित किया जाता है। वहीं से पूरे सिस्टम की निगरानी और कंट्रोल होता है। भारत में इस नेटवर्क के लोग बिहार के जामताड़ा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान से सटे मेवात क्षेत्र और राजस्थान के सीकर जिले में सक्रिय हैं, जो जमीनी स्तर पर काम करते हैं।
भारत में अकाउंट जुटाते हैं थर्ड पर्सन, मीडिएटर कमाते हैं लाखों
साइबर ठगी गिरोह के मुताबिक भारत में ऑनलाइन सट्टा या गेम खिलवाने वालों को मीडिएटर कहा जाता है। असल कंट्रोल दुबई में बैठे आकाओं के पास होता है। वहां भारत और विदेश के लोग कॉरपोरेट ऑफिस खोलकर बैठे हैं, जहां सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग जैसी डिग्री रखने वाले पढ़े-लिखे युवा काम करते हैं।
विशेष सॉफ्टवेयर के जरिए हर कस्टमर की गतिविधि पर नजर रखी जाती है। पूरा सिस्टम तकनीक से नियंत्रित होता है और सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा वॉलेट से बैंक अकाउंट में पैसा ट्रांसफर करने के दौरान अंजाम दिया जाता है।

हाल ही में साइबर ठगों को पकड़ने के लिए पुलिस ने घेराबंदी की थी।
पहले फर्जी बैंक अकाउंट तैयार किए जाते हैं
सट्टे का पैसा ट्रांसफर करने के लिए बिचौलिए के माध्यम से अकाउंट ढूंढा जाता है। इसके लिए 2 तरीके अपनाए जातें हैं। पहला किसी गरीब, मजदूर या अशिक्षित व्यक्ति को तलाशकर उसके नाम से अकाउंट खुलवाया जाता है या फिर बिचौलिए अपने किसी परिचित से उसके अकाउंट में पैसे ट्रांसफर करने के लिए प्रर्सेंटेज का लालच देकर खाता यूज करते हैं। इन खातों को केवल 2 से 3 ट्रांजेक्शन के लिए ही यूज किया जाता है ताकि बैंक को शक न हो। इसके बाद फिर नए खाते की तलाश की जाती है। अकाउंट धारक से आधार कार्ड, पैन कार्ड जैसे जरूरी दस्तावेज ले लिए जाते हैं। इसके बदले उन्हें 10 से 15 हजार रुपए दे दिए जाते हैं। यहीं से साइबर ठगी का खेल शुरू हो जाता है।
थर्ड पर्सन और मीडिएटर की भूमिका
साइबर ठग गिरोह ने इसके लिए अलग-अलग टीमें बना रखी हैं। टीम के सदस्यों को घूमने-फिरने और रहने का पूरा खर्च दिया जाता है। ये टीमें अलग-अलग राज्यों में जाकर ऐसे लोगों की तलाश करती हैं, जिनसे कई बैंक अकाउंट जुटाए जा सकें। एक व्यक्ति से तीन से पांच अकाउंट तक लिए जाते हैं। ठगों की भाषा में ऐसे अकाउंट धारकों को ‘थर्ड पर्सन’ कहा जाता है। एक अकाउंट के बदले थर्ड पर्सन को 20 हजार रुपए तक दिए जाते हैं।
इसके बाद एंट्री होती है मीडिएटर की। मीडिएटर थर्ड पर्सन से एक स्तर ऊपर होता है और उसका सीधा संपर्क दुबई में बैठे साइबर ठगी के आकाओं से रहता है। बातचीत वीडियो कॉल, व्हाट्सऐप और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए सुरक्षित तरीके से की जाती है। इस पूरे खेल में मीडिएटर को कुल मुनाफे का तय 10 फीसदी कमीशन दिया जाता है।

बातचीत में साइबर ठगों ने बताया कि वे कैसे लोगों को अपने जाल में फंसाते हैं।
पैसा ऐसे किया जाता है सुरक्षित
गेम या ऑनलाइन सट्टे के दौरान ठगी गई रकम को सबसे पहले मीडिएटर संभालता है। वह अपनी तय 10 फीसदी कमीशन काटने के बाद बाकी रकम सीधे दुबई में बैठे साइबर ठगी गिरोह के आकाओं के खातों में भेज देता है। ठगों ने बताया कि ठगी के तुरंत बाद रकम को एक के बाद एक 8 से 10 अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया से यह सुनिश्चित किया जाता है कि अगर बैंक या पुलिस को किसी तरह की सूचना भी मिल जाए, तो रकम पहले ही सिस्टम से बाहर निकल चुकी हो।
मीडिएटर पर भी नहीं करते भरोसा
दुबई में बैठे साइबर ठगी के आका अपने मीडिएटर पर भी पूरा भरोसा नहीं करते। हर अकाउंट में 8 से 10 लाख रुपए से ज्यादा रकम नहीं रखी जाती। जैसे ही किसी अकाउंट में यह तय सीमा पूरी होती है, उस कस्टमर के साथ ‘गेम ओवर’ कर दिया जाता है और पूरी रकम तुरंत निकाल ली जाती है। हर मीडिएटर की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए दुबई में अलग-अलग ‘चेकर्स’ तैनात रहते हैं, जो खातों और ट्रांजेक्शंस की लगातार निगरानी करते हैं।
दैनिक भास्कर की टीम जब साइबर ठगी से जुड़े मीडिएटर तक पहुंची, तो उसने चौंकाने वाले खुलासे किए। उसने बताया, “जो मीडिएटर ज्यादा अकाउंट लाता है और जिससे ज्यादा प्रोफिट होता है, उसे प्रमोशन के तौर पर विदेश भेजा जाता है।” उसका दावा है कि हर महीने करोड़ों रुपए की ठगी होती है। वह पिछले 5–6 महीने से इस नेटवर्क से जुड़ा है और अब तक 40 से 50 लाख रुपए कमा चुका है।

जानिए…महादेव गेमिंग ऐप
देश में हाल के दिनों में महादेव गेमिंग सट्टा ऐप का मामला सामने आया था। इस ऐप के जरिए खेलों पर सट्टा लगवाया जाता था। यह ऐप बिना किसी सरकारी लाइसेंस के चल रहा था और अवैध तरीके से लोगों से पैसे ऐंठ रहा था। जांच में सामने आया कि इसमें छत्तीसगढ़ के एक नेता और कुछ फिल्मी हस्तियों पर भी आरोप लगे थे। कार्रवाई के बाद यह ऐप बंद कर दिया गया। लेकिन अब इसी गिरोह के लोगों ने दूसरे नामों से नए गेमिंग ऐप शुरू कर दिए हैं, जिनके जरिए फिर से लोगों को ठगी के जाल में फंसाया जा रहा।

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