आक के पौधे से आक पाडिया एकत्रित करती महिलाएं।
रेतीली जमीन में आसानी से उगने वाले आक के पौधे से अब किसानों को आमदनी भी होगी। इस पौधे को किसान अमूमन खरपतवारी पौधा समझकर हमेशा खेती के दौरान काट देते हैं और पहले इसकी लकड़ी के रेशे से घरेलू स्तर पर ही रस्सी बनाने का काम किया जाता था, लेकिन अब इसे बड़
ग्रामीण विकास एवं चेतना संस्थान के सहयोग से रूमादेवी फाउंडेशन की ओर से इसके बीजों के रेशों से उच्च गुणवत्ता का कपड़ा बनाकर इसके उत्पाद बनाने शुरू कर दिए है। इससे ग्रामीणों क्षेत्रों से आक के बीजों से निकलने वाले रेशों को एकत्रित करने के बाद इसे प्रोसेस करने के बाद कताई कर धागा बनाया जाता है। इससे जैकेट सहित अन्य कपड़ों का निर्माण किया जाता है। हाल ही में फाउंडेशन ने 150 क्विंटल आक के आकपाडिया एकत्रित कर प्रयोग किया, जो सफल रहा। इसके कपड़े की डिमांड भी बढ़ने लगी है।
आक के रेशों से यह बनेंगे उत्पाद
रूमादेवी ने बताया कि आक के रेशों से स्लीपिंग बैग, जैकेट, रजाई जैसे प्रोडक्ट बनाए जा रहे हैं, जो -20 से -40 डिग्री तक के तापमान में भी सर्दी से सुरक्षा देने में सक्षम है। इनका वजन दूसरे फाइबर की तुलना में बहुत ही हल्का होगा और इसे लाने ले जाने में भी आसानी रहेगी।
भास्कर एक्सप्लेनर -आक के रेशे से ऐसे बनता है कपड़ा
आक के रेशे से कपड़ा बनाने की प्रक्रिया में पहले रेशों को आक के फल से अलग किया जाता है। इन हल्के और गर्म रेशों को कताई करके धागा बनाया जाता है और अंत में इस धागे को बुनाई करके कपड़ा तैयार किया जाता है। इस रेशे को जैकेट, स्लीपिंग बैग और रजाइयां बनाई जाती है। यह ठंड के मौसम के लिए उपयुक्त होती है। आक के फल का रेशा बहुत ही मुलायम होता है, इसलिए इसे सीधा कताई करना मुश्किल होता है। कभी कभी इसे थोड़ा हार्ड बनाने के लिए सूती कपड़ा भी मिक्स किया जाता है।तैयार धागों को करघे पर बुना जाता है या लूप बनाकर कढ़ाई की जाती है। आक का पौधा कम पानी में भी उग जाता है और एक बार लगाने पर 10 साल तक रेशा दे सकता है।
प्रायोगिक तौर पर 2 बीघा में की आक की खेती
आक के रेशों की डिमांड को देखते हुए संस्थान अध्यक्ष रूमादेवी ने सनावड़ा गांव में दो बीघा में प्रायोगिक तौर पर आक के पौधों की रोप लगाकर खेती शुरू की है। इससे आक के उत्पादों का कपड़ा बनाने में उपयोग लिया जाएगा। संस्थान सचिव विक्रमसिंह ने बताया कि आने वाले समय में यहां पर आक प्रोसिंग यूनिट लगाने की भी योजना है ताकि इसमें ग्रामीण क्षेत्रों से संगठित उद्योग को तैयार कर लोगों को रोजगार से जोड़ा जा सके। इसको लेकर संस्थान और निट्रा के बीच एमओयू भी हो चुका है और इससे बनने वाले उत्पादों को खरीदा व बेचा जाएगा।
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