इस पूरे घटनाक्रम ने तब और गंभीर रूप ले लिया, जब कर्मचारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई और उसे निलंबित कर दिया गया. याचिकाकर्ता का आरोप है कि जिस कर्मचारी से व्यक्तिगत काम करवाए गए, उसी को बाद में सेवा से बाहर करने की तैयारी की गई. हाईकोर्ट ने प्रारंभिक सुनवाई में जांच प्रक्रिया में गंभीर खामियां पाई हैं और कर्मचारी पर की गई कार्रवाई पर फिलहाल रोक लगा दी है. कोर्ट ने राज्य शासन और नगर निगम कमिश्नर को नोटिस जारी कर जवाब-तलब किया है. अब यह मामला केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक आचरण और जवाबदेही से भी जुड़ गया है.
हाईकोर्ट में कैसे पहुंचा पूरा मामला?
यह मामला दुर्ग नगर निगम के एक कर्मचारी द्वारा दायर रिट याचिका के जरिए हाईकोर्ट पहुंचा. कर्मचारी ने नगर निगम कमिश्नर सुमित अग्रवाल द्वारा जारी आरोप पत्र, निलंबन आदेश और बाद की जांच रिपोर्ट को चुनौती दी है. याचिका में कहा गया है कि कार्रवाई मनमानी, पूर्वाग्रह से ग्रसित और नियमों के खिलाफ है. कर्मचारी का कहना है कि उसे जानबूझकर निशाना बनाया गया.
व्हाट्सएप चैट बनी विवाद की जड़
याचिकाकर्ता कर्मचारी ने हाईकोर्ट में जो दस्तावेज पेश किए हैं, उनमें सबसे अहम व्हाट्सएप चैट की प्रतियां हैं. इन चैट्स में नगर निगम कमिश्नर द्वारा कर्मचारी से कई निजी मांगें करने का दावा किया गया है. कर्मचारी का कहना है कि इन आदेशों को न मानने की स्थिति में उसे प्रताड़ित किया गया.
चैट में किए गए कथित आदेश : हाईकोर्ट में पेश की गई व्हाट्सएप चैट में कमिश्नर की ओर से मांगों का उल्लेख बताया गया है.
- लाल अंगूर लेकर आने के निर्देश
- 10 किलो जायफूल चावल की मांग
- धुरंधर मूवी का टिकट, वह भी कार्नर सीट
- बंगले में लगे वाई-फाई का रिचार्ज
- एक कर्मचारी को समझाने और हटाने की बात
- एमआईसी की बैठक कैंसिल करने को लेकर चर्चा
कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई का पूरा घटनाक्रम
याचिकाकर्ता के अनुसार, 31 जुलाई 2025 को उसे कारण बताओ नोटिस जारी किया गया. इसमें अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति और पदोन्नति को लेकर आरोप लगाए गए. कर्मचारी ने जवाब में कहा कि वह केवल प्रभारी क्लर्क के रूप में फाइल प्रस्तुत करता था और निर्णय सक्षम अधिकारी के स्तर पर लिए गए थे. इसके बावजूद 7 अगस्त 2025 को उसे निलंबित कर दिया गया.
जांच रिपोर्ट पर उठे सवाल
14 जनवरी 2026 को अपर कलेक्टर द्वारा प्रस्तुत जांच रिपोर्ट को भी कर्मचारी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी है. कोर्ट ने प्रारंभिक तौर पर माना कि जांच अधिकारी ने आरोपों को साबित करने के लिए किसी भी सूचीबद्ध गवाह से पूछताछ नहीं की. यह प्रक्रिया सेवा नियमों के विपरीत पाई गई.
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जस्टिस पीपी साहू की सिंगल बेंच ने कहा कि जांच की प्रक्रिया प्रथम दृष्टया त्रुटिपूर्ण प्रतीत होती है. जांच रिपोर्ट में बिना गवाहों के बयान दर्ज किए दंड प्रस्तावित किया गया है. यह अनुशासनात्मक प्रक्रिया की मूल भावना के खिलाफ है.
कोर्ट के आदेश को समझें
- कर्मचारी के खिलाफ जारी अनुशासनात्मक कार्रवाई पर रोक
- राज्य शासन और नगर निगम कमिश्नर को नोटिस
- तीन सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश
- अगली सुनवाई की तारीख 23 फरवरी तय
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