इस वर्ष जोड़बीड़ में दुनिया के सबसे बड़े गिद्धों में शामिल सिनेरियस वल्चर की मौजूदगी ने पक्षी प्रेमियों और शोधकर्ताओं का ध्यान आकर्षित किया है. इसके साथ ही पीली चोंच वाला इजिप्शियन वल्चर, लाल सिर वाला किंग वल्चर सहित कई अन्य प्रजातियां भी यहां देखी गई हैं. पक्षी विशेषज्ञ डॉ. दाऊ लाल बोहरा ने बताया कि इतनी बड़ी संख्या में विदेशी और देशी गिद्ध एक ही स्थान पर सुरक्षित रूप से विचरण कर रहे हैं.
जोड़बीड़ बना गिद्धों का सुरक्षित आशियाना
जोड़बीड़ क्षेत्र में करीब 50 बीघा भूमि पर विकसित संरक्षण केंद्र गिद्धों के लिए आदर्श आवास बन चुका है. शहर में मरने वाले आवारा पशुओं को इसी क्षेत्र में डाला जाता है, जो गिद्धों के लिए प्राकृतिक और सबसे उपयुक्त भोजन है. प्रशासन ने मृत पशुओं की चमड़ी उतारने का ठेका भी दिया हुआ है, जिससे गिद्धों को भोजन पाने में कठिनाई नहीं होती. यही सुव्यवस्था गिद्धों को यहां बार-बार लौटने के लिए प्रेरित करती है.
यूरोप से बीकानेर तक गिद्धों की उड़ान
दिसंबर से फरवरी के बीच यूरोप और मध्य एशिया के कई देशों में भारी बर्फबारी होती है. अत्यधिक ठंड और भोजन की कमी के कारण ये पक्षी अपेक्षाकृत गर्म इलाकों की ओर उड़ान भरते हैं. रूस, कजाकिस्तान, मंगोलिया जैसे देशों से निकलकर ये गिद्ध अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रास्ते भारत में प्रवेश करते हैं और बीकानेर का जोड़बीड़ उनका प्रमुख पड़ाव बनता है.
जोड़बीड़ में दिखीं 15 से ज्यादा गिद्ध प्रजातियां
विशेषज्ञों के अनुसार, दुनियाभर में गिद्धों की लगभग 23 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 15 से अधिक प्रजातियां जोड़बीड़ क्षेत्र में दर्ज की गई हैं. इनमें हिमालयन ग्रिफॉन, यूरोशियन ग्रिफॉन, सिनेरियस वल्चर, इजिप्शियन वल्चर, इम्पीरियल ईगल, स्टेपी ईगल, लेगर फाल्कन, डेजर्ट व्हीटर, रोजी स्टार्लिंग, ब्लैक रेडस्टार्ट सहित कई अन्य दुर्लभ पक्षी शामिल हैं.
बीकानेर में बढ़ी विदेशी गिद्धों की संख्या
जोड़बीड़ में यूरोशियन ग्रिफॉन, सिनेरियस वल्चर और इजिप्शियन वल्चर की संख्या लगातार बढ़ रही है. इजिप्शियन वल्चर स्थानीय है, जबकि बाकी प्रजातियां विदेशी प्रवासी हैं. फरवरी के बाद मौसम में बदलाव के साथ ये विदेशी पक्षी वापस अपने मूल देशों की ओर लौट जाएंगे.
गिद्ध संरक्षण से मजबूत होता ईको सिस्टम
पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि गिद्ध ईको सिस्टम की टॉप चेन में शामिल होते हैं. वे मृत पशुओं को खाकर वातावरण को स्वच्छ रखने में अहम भूमिका निभाते हैं. यदि इसी तरह अन्य राज्यों में भी गिद्ध संरक्षण के लिए सुनियोजित प्रयास किए जाएं, तो विलुप्त होती इन प्रजातियों को नई जिंदगी मिल सकती है.
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