Gola Devi Success Story: भरतपुर जिले के नदबई क्षेत्र के बरौली रान गांव की गोला देवी ने पारंपरिक मिट्टी कला को नई पहचान देकर सफलता की मिसाल पेश की है. संघर्षों से भरे सफर में सीमित संसाधनों और घटती मांग के बीच उन्होंने हार नहीं मानी. टेराकोटा कला अपनाकर नए प्रयोग किए और बाजार की जरूरतों को समझा. आज उनके बनाए सजावटी व उपयोगी उत्पादों की अच्छी मांग है. वे न सिर्फ आत्मनिर्भर बनी हैं, बल्कि दर्जनों ग्रामीण महिलाओं को रोजगार देकर उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त भी कर रही हैं.
भरतपुर जिले के नदबई क्षेत्र के बरौली रान गांव की गोला देवी ने पारंपरिक मिट्टी कला को नई पहचान देकर सफलता की मिसाल पेश की है. कभी मटके और कुल्हड़ बनाकर परिवार चलाने वाली गोला देवी ने टेराकोटा कला को अपनाकर अपनी किस्मत बदल ली. आज वे सुंदर सजावटी और उपयोगी टेराकोटा उत्पाद तैयार कर रही हैं, जिनकी बाजार में अच्छी मांग है. इससे वे न केवल आत्मनिर्भर बनी हैं, बल्कि गांव की दर्जनों महिलाओं को रोजगार देकर उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त भी कर रही हैं. गोला देवी की यह यात्रा ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है.

करीब 23 वर्ष पहले शुरू हुआ गोला देवी का सफर संघर्षों से भरा रहा. सीमित संसाधन, कम आमदनी और बाजार की अनिश्चित मांग के बीच परिवार का पालन-पोषण करना आसान नहीं था. उस समय पारंपरिक मिट्टी के बर्तनों की मांग धीरे-धीरे घटने लगी थी, जिससे उनकी आमदनी पर सीधा असर पड़ा. आर्थिक दबाव बढ़ने लगा और घर चलाना मुश्किल होने लगा. ऐसे हालात में गोला देवी ने हार मानने के बजाय बदलते समय और बाजार की जरूरतों को समझने का फैसला किया. उन्होंने नई तकनीक सीखने, डिजाइन में बदलाव और टेराकोटा कला अपनाने का संकल्प लिया. यही निर्णय उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ.

उन्होंने पारंपरिक मटके और कुल्हड़ों के साथ-साथ टेराकोटा उत्पाद बनाने की शुरुआत की. शुरुआत में यह काम काफी चुनौतीपूर्ण रहा, क्योंकि नई डिजाइन, बेहतर फिनिशिंग और ग्राहकों की पसंद के अनुसार उत्पाद तैयार करना आसान नहीं था. कई बार प्रयोग असफल भी हुए, लेकिन गोला देवी ने हिम्मत नहीं हारी. लगातार मेहनत, नए प्रयोग और सीखने की ललक ने उन्हें आगे बढ़ाया. धीरे-धीरे उनके बनाए टेराकोटा के सजावटी आइटम, गमले, दीये, शोपीस और घरेलू उपयोग की वस्तुएं बाजार में पसंद की जाने लगीं. इससे उनकी पहचान बढ़ी और आमदनी में भी लगातार सुधार होने लगा.
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समय के साथ गोला देवी का काम गांव की सीमाओं से निकलकर आस-पास के कस्बों और शहरों तक पहुंच गया. स्थानीय मेलों, प्रदर्शनियों और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से उन्हें अपने उत्पाद प्रदर्शित करने के अवसर मिले, जिससे उनकी पहचान लगातार मजबूत होती गई. उनके टेराकोटा उत्पादों की बढ़ती मांग को देखते हुए उन्होंने गांव की अन्य महिलाओं को भी इस कार्य से जोड़ना शुरू किया. आज गोला देवी के साथ दर्जनों महिलाएं जुड़ी हुई हैं, जो टेराकोटा के सजावटी और उपयोगी उत्पाद बनाकर नियमित आय अर्जित कर रही हैं. इससे न सिर्फ उनका आर्थिक स्तर सुधरा है, बल्कि महिलाओं में आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता भी बढ़ी है.

घर की चारदीवारी तक सीमित रहने वाली महिलाएं अब गोला देवी के मार्गदर्शन में अपने हुनर के दम पर आत्मनिर्भर बन रही हैं. उनकी यह पहल ग्रामीण क्षेत्रों में महिला सशक्तिकरण का मजबूत उदाहरण बन चुकी है. गोला देवी ने साबित कर दिया कि मेहनत, धैर्य और दूरदर्शिता के साथ पारंपरिक कला भी आधुनिक बाजार में नई पहचान बना सकती है. टेराकोटा शिल्प के जरिए उन्होंने न सिर्फ अपनी जिंदगी बदली, बल्कि कई परिवारों को आर्थिक संबल भी दिया. उनकी सफलता की कहानी आज अनेक महिलाओं के लिए प्रेरणा और उम्मीद की नई किरण बन गई है, जो संघर्षों से जूझते हुए आगे बढ़ने का साहस देती है.
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