नवजात गाय या भैंस के जन्म के साथ ही ‘गाड़ चढ़ाना’ या बधाण पूजन की परंपरा निभाई जाती है. पर्वतीय समाज में धिनाई (दूध-दही) को सबसे बड़ा धन माना गया है. आइए जानते हैं कि नवजात बछड़े के जन्म के बाद कौन-कौन सी परंपरा निभाई जाती है.
उत्तराखंड की पहाड़ी संस्कृति में बधाण देवता या बौधाण देवता को पशुओं की रक्षा और समृद्धि का देवता माना जाता है. कुमाऊं और गढ़वाल के कई क्षेत्रों में दुधारू पशुओं की सुरक्षा और दूध-दही की संपन्नता इनकी कृपा से जुड़ी मानी जाती है. लोकमान्यता है कि जब तक बधाण देवता की पूजा ना हो, तब तक पशु का दूध अछूत रहता है. इसीलिए नवजात गाय या भैंस के जन्म के साथ ही ‘गाड़ चढ़ाना’ या बधाण पूजन की परंपरा निभाई जाती है. पर्वतीय समाज में धिनाई (दूध-दही) को सबसे बड़ा धन माना गया है.

कुमाऊं में दूध-दही को इतना पवित्र माना गया कि इसके लिए विशेष देवता तक माने गए. परंपरा के अनुसार, नवजात पशु का दूध 11 दिनों तक रोटी या चावल के साथ नहीं खाया जाता. यह दूध सिर्फ बच्चों को दिया जाता है, महिलाएं और देव डांगर भी इसे नहीं छूते. 11वें दिन दूध से ‘लापसी’ बनाकर देवता को भोग चढ़ाया जाता है, तभी इस दूध का सामान्य उपयोग शुरू होता है. पहाड़ों में यह नियम इसलिए बना, ताकि नवजात बच्चा पूरी मात्रा में दूध पी सके और पशु कमजोर न पड़े. यह परंपरा आज भी कई गांवों में कायम है.

उत्तराखंड में गाय या भैंस के बच्चे के जन्म के 7, 9 या 11वें दिन ‘बधाण पूजन’ किया जाता है. इस दिन घर में विशेष पूजा होती है, जिसे कई क्षेत्रों में ‘गाड़ चढ़ाना’ भी कहते हैं. शुद्ध गोबर से गणेश जी का प्रतीक बनाया जाता है और लकड़ी के खूंटे (कील) को पूजा स्थल माना जाता है. नवजात पशु को फूलों की माला पहनाई जाती है और गुड़ का मंत्र पढ़कर खिलाया जाता है. पूजा के बाद लापसी का भोग चढ़ाया जाता है. मान्यता है कि इस विधि से पशु स्वस्थ रहता है और घर में धिनाई की कमी नहीं होती.
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कुमाऊं के विभिन्न क्षेत्रों में बधाण देवता की पूजा की विधि और नियम अलग-अलग हैं. कहीं सिर्फ बधाण देवता की पूजा होती है तो कहीं 11वें दिन बधाण और 22वें दिन चमू देवता की भी पूजा की जाती है. स्थानीय बोली में इसे ‘केरी’ कहा जाता है, जैसे बधाण केरी, चमू केरी. यही कारण है कि पहाड़ों में कहा जाता है कोई बधाण केरी, कोई चमू केरी. यह भेद सिर्फ पूजा का नहीं, बल्कि खान-पान की परंपराओं और जीवनशैली का भी प्रतीक है. पर्वतीय समाज ने पशुपालन को संस्कृति का मूल हिस्सा माना है.

पुरानी परंपराओं में धिनाई यानी दूध-दही को सबसे बड़ा धन माना जाता था. विवाह के लिए भी लड़के के घर में धिनाई की समृद्धि पहली शर्त मानी जाती थी. बिना दूध वाली चाय को अभिशाप समझने जैसी लोकमान्यताएं भी थीं. ऐसे नियमों से पता चलता है कि पहाड़ों में दूध सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि समृद्धि, शुद्धता और आस्था का प्रतीक रहा है. पशुओं की देखभाल, उनके स्वास्थ्य और दूध की पवित्रता पर पूरा समाज निर्भर करता था. इसी सोच ने बधाण और चमू जैसे पशु-देवताओं की पूजा को जन्म दिया.

कुमाऊं के कई गांवों में बधाण देवता की पूजा पशु के खूंटे (कील) पर की जाती है. गाय के गोबर से बधाण का प्रतीक बनाकर ताजा दूध का भोग लगाया जाता है. नवजात के नामकरण का यह संस्कार घर की सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. कई गांवों में पूजा घर पर होती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में बधाण देवता के मंदिर में भी दूध चढ़ाने की परंपरा है. नैनीताल जिले में स्थित पंगोट कोटाबाग का बधाण थली मंदिर इस आस्था का प्रसिद्ध केंद्र है, जहां हर साल हजारों ग्रामीण पूजा करने पहुंचते हैं.

बागेश्वर आचार्य कैलाश उपाध्याय ने लोकल 18 को बताया कि लोककथा के अनुसार, प्राचीन काल में बधाण पूजा घर के चूल्हे के पास होती थी और भगवान गणेश स्वयं बालक रूप में भोग खाने आते थे. एक बार जल्दबाजी में एक बुजुर्ग महिला ने गर्म खीर उनके हाथ में रख दी, जिससे उनका हाथ जल गया. इससे गणेश जी रूष्ट हो गए और उस महिला की गाय ने दूध देना बंद कर दिया. बाद में देवताओं ने बताया कि पूजा पानी वाले स्थान पर की जानी चाहिए, तभी से बधाण पूजन घर के चूल्हे से हटाकर पानी के स्रोत के पास किया जाने लगा. यह कथा आज भी गांवों में सुनाई जाती है.

कई गांवों में आज भी शाम के दूध को अछूत माना जाता है और इसका उपयोग भोजन में नहीं किया जाता. लोकमान्यता है कि रात के समय नकारात्मक शक्तियां सक्रिय होती हैं, इसलिए शाम का दूध देवताओं को नहीं चढ़ाया जाता. वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो शाम का दूध अधिक गाढ़ा होता है और जल्दी खराब भी होता है, इसलिए इसे सीमित उपयोग में रखा गया. बधाण पूजन के बाद ही दूध को सामान्य भोजन में शामिल करने की परंपरा भी इसी सोच से जुड़ी है. पहाड़ों की ये परंपराएं संस्कृति और विज्ञान दोनों का समन्वय दिखाती हैं.
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