पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि गर्भपात को लेकर महिला की इच्छा सर्वोपरि है और इसके लिए पति की सहमति न तो जरूरी है और न ही कानून इसकी मांग करता है। कोर्ट ने कहा कि मां बनने या न बनने का फैसला महिला का निजी और संवैध
शादी के बाद बिगड़े हालात, तलाक की प्रक्रिया में दंपती याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उसकी शादी 2 मई 2025 को हुई थी, लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही पति के साथ रिश्ते बेहद तनावपूर्ण हो गए। हालात इतने बिगड़े कि दोनों इस समय तलाक की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। महिला ने कहा कि लंबे समय से वह डिप्रेशन और एंग्जायटी से पीड़ित है और अनचाही गर्भावस्था के कारण उसकी मानसिक स्थिति और खराब हो गई, जिसके बाद उसने हाईकोर्ट का रुख किया।
PGI मेडिकल बोर्ड ने दी गर्भपात की मंजूरी मामले की गंभीरता को देखते हुए 22 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने PGI चंडीगढ़ को महिला की जांच के लिए मेडिकल बोर्ड गठित करने के निर्देश दिए थे। मेडिकल बोर्ड ने 23 दिसंबर 2025 को जांच के बाद रिपोर्ट सौंपी, जिसमें बताया गया कि गर्भावस्था 16 हफ्ते और 1 दिन की है, गर्भ में एक स्वस्थ भ्रूण है, कोई जन्मजात विकृति नहीं पाई गई है। महिला मानसिक रूप से अपनी स्वतंत्र सहमति देने में सक्षम है और वह इसके लिए मेडिकली गर्भपात के लिए फिट है
कोर्ट ने क्या कहा? इन तथ्यों के आधार पर अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या गर्भपात के लिए पति की सहमति जरूरी है? इस पर अदालत ने Medical Termination of Pregnancy Act, 1971 की व्याख्या करते हुए कहा कि कानून में कहीं भी पति की सहमति की शर्त नहीं है, विवाहित महिला खुद यह तय करने में सक्षम है कि वह गर्भ जारी रखना चाहती है या नहीं। “महिला की इच्छा और सहमति ही निर्णायक है, किसी अन्य अनुमति की आवश्यकता नहीं”
एक हफ्ते में गर्भपात कराने के निर्देश हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि महिला एक सप्ताह के भीतर PGI चंडीगढ़ या किसी अन्य अधिकृत अस्पताल में सुरक्षित गर्भपात करा सकती है। साथ ही अस्पताल को निर्देश दिए गए कि प्रक्रिया के दौरान सभी मेडिकल प्रोटोकॉल और सावधानियों का सख्ती से पालन किया जाए।
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