इस समय पौधों में बालियां निकलने लगती हैं और दाना दूध अवस्था में रहता है. इसे गेहूं की सबसे अहम अवस्था माना जाता है. अगर इस दौरान खेत में नमी की कमी हो जाए या पौधों को जरूरी पोषण न मिले, तो दाना कमजोर रह जाता है और उत्पादन घट जाता है. इसलिए किसानों को इस स्टेज पर फसल की नियमित निगरानी करनी चाहिए.
ना ज्यादा पानी, ना कम, सिंचाई का रखें विशेष ध्यान
देवघर के कृषि विशेषज्ञ वकील यादव ने लोकल 18 के संवाददाता से बातचीत करते हुए कहा कि सबसे पहले बात करें सिंचाई की. इस समय खेत में पर्याप्त नमी होना बहुत जरूरी है, ताकि पौधे मिट्टी से पोषक तत्वों को अच्छे से ले सकें. समय पर हल्की और संतुलित सिंचाई करें. लेकिन ध्यान रखें, जरूरत से ज्यादा पानी देने से खेत में पानी भर सकता है, जिससे पीलापन जैसी बीमारी लगने का खतरा बढ़ जाता है. इसलिए खेत में जल निकास सही रखें और पानी का ठहराव न होने दें. गलन रोग से बचाव के लिए पोटाश और फास्फोरस युक्त खाद का उपयोग फायदेमंद होता है.
खेतों में दीमक की समस्या से हो सकते हैं परेशान
बालियां निकलते समय कई किसानों के खेतों में दीमक की समस्या भी देखने को मिलती है. दीमक पौधों की जड़ों और तनों को नुकसान पहुंचाती है, जिससे फसल कमजोर हो जाती है और पैदावार पर सीधा असर पड़ता है. अगर समय रहते दीमक पर नियंत्रण न किया जाए, तो नुकसान बढ़ सकता है. इसलिए खेत में दीमक दिखते ही उचित उपाय करें, ताकि फसल की बढ़वार सही बनी रहे.
सामान्य खाद से पोषण पूरा नहीं मिलता
गेहूं को सिर्फ सामान्य खाद से पूरा पोषण नहीं मिल पाता. पौधों को माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की जरूरत होती है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, बालियां निकलते समय एनपीके 0:52:34 और बोरान का छिड़काव करना काफी लाभकारी होता है. इसके लिए प्रति एकड़ 1 किलो एनपीके 0:52:34 और 100 ग्राम बोरान को लगभग 150 लीटर पानी में अच्छी तरह घोल लें. फिर स्प्रे पंप से पूरे खेत में समान रूप से छिड़काव करें.
इस तरह की सही देखभाल से गेहूं के दाने मजबूत बनते हैं, उनमें अच्छी चमक आती है और भराव बेहतर होता है. नतीजा यह होता है कि किसान को न सिर्फ अच्छी पैदावार मिलती है, बल्कि गेहूं की गुणवत्ता भी बेहतर होती है.
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