आदिवासियों ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण (एसआईआर) में उनके नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं। हजारों आदिवासियों को नोटिस जारी कर नागरिकता का सबूत मांगा जा रहा है, जिससे उनकी नागरिकता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
नरेगा मजदूरी और कानून पर सवाल
संगठन के हरसिंग जमरे ने बताया कि जहां हजारों आदिवासी पलायन को मजबूर हैं, वहीं रोजगार के साधन बढ़ाने के बजाय नया कानून पारित कर रोजगार गारंटी को कमजोर किया गया है। उन्होंने कहा कि सरकार खुद 467 रुपए प्रतिदिन को न्यूनतम आवश्यकता मानती है, लेकिन नरेगा में 261 रुपए देकर आदिवासियों से बेगारी करवाई जा रही है।
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100 दिन का काम नहीं मिलने का दावा
आदिवासियों का कहना है कि पिछले 10-15 वर्षों में किसी को भी 100 दिन का काम नहीं मिला और अब 125 दिन का झूठा वादा किया जा रहा है। उनका आरोप है कि काम कहां और कब खुलेगा, यह तय करने का अधिकार शासन-प्रशासन के पास रखा गया है, जिससे पेसा कानून का उल्लंघन हुआ है और ग्राम सभा से काम तय करने का अधिकार छीन लिया गया है।
बिजली बिल, भुगतान और तकनीकी प्रक्रियाओं पर आरोप
प्रदर्शनकारियों ने फर्जी बिजली बिल वसूलने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि बिना मीटर रीडिंग के गेहूं सिंचाई के समय बिजली सप्लाई के बदले किसानों से पैसे लिए जा रहे हैं। मोबाइल हाजिरी, जियो-टैगिंग और आधार-केवाईसी के जरिए मजदूरी और भुगतान रोके जाने तथा बजट न होने का बहाना बनाकर काम न देने जैसी समस्याओं का भी उल्लेख किया गया।
चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज
संगठन की ना बाई ने कहा कि जिन लोगों ने देश की आजादी और जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए सबसे पहले कुर्बानी दी, आज उन्हीं के बच्चों को रोजगार, दाम और पहचान से वंचित किया जा रहा है। जागृत आदिवासी दलित संगठन ने एसआईआर में आदिवासियों और अन्य गरीबों के वोट के अधिकार छूटने के खिलाफ चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई है।
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