कभी खेतों की हरियाली से पहचाने जाने वाला झाड़सिरतोली गांव आज वीरान है। एक समय यहां 30 परिवार साथ रहते थे लेकिन अब पूरा गांव महज एक परिवार के छह लोगों की मौजूदगी पर टिका है। मूलभूत सुविधाओं की कमी ने लोगों को अपनी जन्मभूमि से दूर जाने को मजबूर कर दिया। रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य की तलाश में ग्रामीण हल्द्वानी, दिल्ली और तहसील-जिला मुख्यालयों की ओर पलायन कर गए।
जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव तक पहुंचने के लिए आज भी सड़क से चार किलोमीटर पैदल सफर करना पड़ता है। जिन घरों में कभी जीवन की रौनक थी, वे अब खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। गांव का एकमात्र प्राथमिक विद्यालय भी बच्चों के अभाव में वर्षों पहले बंद हो गया। अब इन सूने मकानों में इंसानों की जगह बंदर और अन्य जंगली जानवरों का डेरा है। किसी आपात स्थिति में मदद पहुंचना भी चुनौती बना हुआ है।
धान और फलों के लिए थी पहचान
झाड़सिरतोली और आसपास का क्षेत्र कभी धान और फलों की पैदावार के लिए जाना जाता था। ग्राम पंचायत हल्दू खर्क के अमरूद, माल्टा, नारंगी और केले की मांग दूर-दूर तक थी। धान, गेहूं, मडुवा, आंवला और सब्जियों की खेती से गांव आत्मनिर्भर था। लेकिन पलायन और जंगली जानवरों की बढ़ती समस्या ने खेती को नुकसान पहुंचाया। फलदार बगीचे उजड़ गए और खेत धीरे-धीरे बंजर होने लगे।
दिलों में दर्द
बंदर और लंगूर की वजह से फलों के बगीचे समाप्त हो गए हैं। गांव के खेत अब बंजर होने लगे हैं। पूरी तरह सन्नाटा पसरा रहता है। खंडहर मकानों में अब कोई नहीं आना चाहता। -नीरज गहतोड़ी, स्थानीय युवा
अधिकांश गांव मूलभूत सुविधाओं के अभाव में खाली होते जा रहे हैं। ऐसे ही यह गांव भी खाली हो गया है। गांव से पलायन रोकने के लिए ठोस रणनीति की जरूरत है। -दिनेश चंद्र गहतोड़ी, प्रधान, गहतोड़ा
एक समय गांव पूरी तरह आबाद था। लोगों की आवाजें गूंजा करती थी, लेकिन आज तो कोई दुख-दर्द बांटने वाला कोई नहीं है। धान से खेत लहलहाते थे। पलायन से सब खत्म हो गया है। -कमल गहतोड़ी, स्थानीय व्यापारी
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