मारवाड़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और लोक परंपराओं का अद्भुत संगम 3 मार्च को धुलंडी के अवसर पर मंडोर क्षेत्र में देखने को मिलेगा। इस वर्ष 633वीं रावजी की गैर तथा चैनपुरा विकास समिति की ओर से सामूहिक गैर पारंपरिक उल्लास के साथ निकाली जाएगी। यह आयोजन भाईचारे, सामाजिक समरसता और फाग गीतों की गूंज के साथ सदियों पुरानी बेरों की परंपरा को जीवंत करता है।
विजय की स्मृति से जुड़ी राव जी की गैर
मंडोर किले पर तुर्कों पर विजय की स्मृति में निकाली जाने वाली राव जी की गैर मारवाड़ की सबसे प्राचीन गैरों में से एक मानी जाती है। परंपरा के अनुसार इस दिन एक अविवाहित युवक को एक दिन के लिए राव राजा बनाया जाता है। राव जी की सवारी मंडोर उद्यान से शुरू होकर विभिन्न बेरों से गुजरते हुए लगभग तीन किलोमीटर का सफर तय करती है, जिसे पूरा करने में करीब पांच घंटे लगते हैं।
गैर में शामिल गैरिए सफेद वेशभूषा और रंग-बिरंगी पगड़ियां पहनकर चंग की थाप पर पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत करते हैं। इस गैर की विशेषता यह है कि इसमें महिलाओं का प्रवेश वर्जित रहता है। शाम करीब 7 बजे मंडोर कुण्ड में डुबकी के साथ यह आयोजन संपन्न होता है। इसमें खोखरिया बेरा, भदवाता बेरा, नागौरी बेरा सहित कुल नौ बेरों के लोग भाग लेते हैं।
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समावेशी परंपरा की चैनपुरा गैर
वहीं चैनपुरा विकास समिति की ओर से निकाली जाने वाली सामूहिक गैर अपनी समावेशी परंपरा के लिए जानी जाती है। यह गैर दोपहर 3 बजे चैनपुरा बेरा से रवाना होकर लालसागर स्थित बालाजी मंदिर तक पहुंचेगी। इस आयोजन का उद्देश्य आपसी प्रेम, सौहार्द और सामाजिक एकता को बढ़ावा देना है। इस गैर में पुरुषों के साथ महिलाएं भी पारंपरिक वेशभूषा में फाग गीत गाते हुए और चंग बजाते हुए शामिल होती हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी आयु वर्ग के लोग उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं।
मंडोर महोत्सव के संस्थापक प्रधान राव हेमा गहलोत के अनुसार आयोजन को लेकर सभी बेरों में उत्साह का माहौल है। मंडोर कुण्ड की सफाई सहित तैयारियां अंतिम चरण में हैं। 3 मार्च को पूरा क्षेत्र ‘होली है’ के उद्घोष और चंग की थाप से गूंज उठेगा, जो जोधपुर की प्राचीन लोक संस्कृति का सजीव दर्शन कराएगा।
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