कहते हैं, मां अपने भक्तों की पुकार कभी खाली नहीं लौटातीं। चमत्कार हुआ। सफल प्लास्टिक सर्जरी के बाद बेटा धीरे-धीरे सामान्य जीवन की ओर लौट आया। बेटे की मुस्कान लौटी, तो पिता के जीवन में भी फिर से उजाला भर गया। लेकिन देवीदास के मन में एक ही बात गूंज रही थी। अब वचन निभाना है।
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भीषण ठंड, कठोर रास्ते और असहनीय पीड़ा की परवाह किए बिना देवीदास अमरावती से माता वैष्णो देवी के धाम तक लगभग 2050 किलोमीटर की कठिन यात्रा पर निकल पड़े लुढ़कते हुए। आज जब वे मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले से गुजर रहे हैं, तब तक करीब 850 किलोमीटर का सफर पूरा कर चुके हैं। हाथों और पैरों में लोहे की जंजीरें बंधी हैं, शरीर छलनी है, लेकिन आंखों में विश्वास अडिग है। हर दिन करीब 12 किलोमीटर लुढ़कते हुए आगे बढ़ते हैं और जहां रात होती है, वहीं खुले आसमान के नीचे विश्राम करते हैं।
उनके साथ एक साथी साइकिल पर चलता है, जिसमें जीवन की न्यूनतम जरूरतें हैं। देवीदास की यह यात्रा केवल आस्था की कहानी नहीं, बल्कि हर उस माता-पिता के लिए संदेश है, जो अपनी औलाद की सलामती के लिए खुद को भी भूल सकता है। यह कहानी सिखाती है कि जब प्रेम, विश्वास और संकल्प एक साथ चलें, तो असंभव भी संभव बन जाता है।
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