आठवीं तक पढ़ाई
अंधे थेथा राम ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि उन्होंने आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की है. इसके बाद उन्होंने चना मुर्रा बेचने का काम शुरू कर दिया. उन्होंने कहा कि आठवीं पास करने के बाद से ही मैं चना मुर्रा बेच रहा हूं. इसी काम से मेरी जिंदगी की गुजर-बसर हो रही है.
दृष्टि बाधित होने के बावजूद नहीं मानी हार
थेथा राम ने अपनी आंखों की स्थिति के बारे में बताते हुए कहा कि वे पूरी तरह देख नहीं पाते. जन्म से उनकी एक आंख से बिल्कुल भी दिखाई नहीं देता, जबकि दूसरी आंख से भी बहुत कम नजर आता है. इसके बावजूद वे रोज अपने ठिकाने तक आना-जाना करते हैं और मेहनत से अपना काम करते हैं.
रोज 100 से 150 रुपये की कमाई से चलता है जीवन
दैनिक आमदनी के सवाल पर थेथा राम ने बताया कि उन्हें रोज करीब 100 से 150 रुपये की कमाई हो जाती है. इसी आमदनी से वे अपने जीवन की जरूरतें पूरी करते हैं. कभी-कभी अच्छी बिक्री होने पर कमाई थोड़ी बेहतर भी हो जाती है.
गरीबी बनी पढ़ाई छूटने की वजह
पढ़ाई आगे क्यों नहीं कर पाए, इस सवाल पर थेथा राम ने बताया कि उन्हें पढ़ने का बहुत शौक था, लेकिन उस समय पास में स्कूल नहीं था. राजापुर तक स्कूल दूर होने के कारण आने-जाने में परेशानी होती थी. आर्थिक स्थिति भी कमजोर थी, इसलिए मजबूरी में पढ़ाई छोड़नी पड़ी.
जानिए परिवार का हाल
थेथा राम ने बताया कि उनका जन्म वर्ष 1988 है. उनके परिवार में कुल दो सदस्य हैं, जिनमें उनका एक भाई भी शामिल है. सीमित संसाधनों के बावजूद वे आत्मनिर्भर बने हुए हैं.
युवाओं को संदेश
युवाओं को संदेश देते हुए थेथा राम ने कहा कि सबको कुछ न कुछ मेहनत करके करना चाहिए. मैं ठीक से देख नहीं पाता, फिर भी मेहनत कर रहा हूं, जो पूरी तरह स्वस्थ हैं और देख सकते हैं, उन्हें इधर-उधर भटकने के बजाय कुछ काम करना चाहिए.
स्थानीय लोगों की जुबानी थेथा राम की पहचान
स्थानीय निवासी पुरुषोत्तम पुरोहित ने लोकल 18 को बताया कि वे थेथा राम को लंबे समय से जानते हैं. गांव और आसपास के लोग उन्हें ‘थेथा राम’ के नाम से जानते हैं. उन्होंने बताया कि जामकानी चौक, जो क्षेत्र का मुख्य बस स्टैंड और प्रमुख केंद्र है, वहां थेथा राम रोज तय समय पर चना मुर्रा बेचते नजर आते हैं.
10 रुपये में भी मिलती है पूरी संतुष्टि
पुरुषोत्तम पुरोहित ने थेथा राम के चना मुर्रा की जमकर तारीफ की. उन्होंने कहा कि मैं जब से होश संभाला है, तब से इन्हें मेहनत करते देख रहा हूं. इनका चना बहुत स्वादिष्ट होता है. अभी थोड़ी देर पहले ही कोई कह रहा था कि घर में 100 रुपये का चना बनाते हैं, फिर भी वो स्वाद नहीं आता. लेकिन यहां 10 रुपये का चना खा लेने से पूरी संतुष्टि मिल जाती है.
मेहनत से बनी पहचान
स्थानीय लोगों का कहना है कि थेथा राम जैसे लोग समाज के लिए प्रेरणा हैं. जो व्यक्ति ठीक से देख भी नहीं सकता, वह भी ईमानदारी और मेहनत से अपना जीवन चला रहा है. ऐसे में स्वस्थ युवाओं को उनसे सीख लेनी चाहिए.
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