नेत्रहीन निर्दिया गिरी का संगीत बना सहारा
निर्दिया गिरी ग्राम पंचायत झेराडीह, विकासखंड लुण्ड्रा के निवासी हैं. उन्होंने लोकल 18 को बताया कि वे बचपन से ही नेत्रहीन हैं. पढ़ाई-लिखाई नहीं कर पाने के कारण उन्होंने संगीत को ही अपने जीवनयापन का साधन बनाया. डफली बजाते हुए वे भजन, छत्तीसगढ़ी और फिल्मी गीत गाकर अपनी पहचान बना चुके हैं
कहां से शुरू हुआ संगीत का सफर
निर्दिया गिरी ने बताया कि उनके संगीत जीवन की शुरुआत पर्राडांड से हुई. वहां उनके एक शहीद भैया थे, जो जेलर/दरोगा के पद पर थे. उन्हीं से उन्हें पहली बार एक बाजा मिला. उसी बाजे को बजाते-बजाते उनका जुड़ाव संगीत से गहराता गया. बाद में बाजा टूट जाने पर उन्होंने नया बाजा खरीदा. अब तक वे 12 से 15 डफली बदल चुके हैं.
रेडियो बना गुरु
निर्दिया गिरी ने बताया कि उन्होंने डफली बजाना किसी से नहीं सीखा. उनके पास एक रेडियो था, जिसमें गाने सुनकर वे खुद ताल समझते थे. जहां कहीं भी टेप रिकॉर्डर पर गाने बजते थे, वे वहां जाकर बैठ जाते थे. एक-एक गाने को कई बार सुनकर वे उसे याद कर लेते थे. इसी अभ्यास से आज उन्हें 25 से 30 गाने पूरे याद हैं, जबकि अनगिनत गानों की कुछ पंक्तियां उन्हें अब भी याद हैं.
खुश होकर लोग देते हैं पैसे
जब उनसे पूछा गया कि वे रोज यहां कैसे पहुंचते हैं, तो उन्होंने बताया कि उनका बेटा उन्हें छोड़ने आता है. इसके बाद वे खरसिया नाका से ऑटो पकड़कर खुद अंबिकापुर पहुंच जाते हैं. यहां बैठकर वे गाना गाते हैं और लोगों का मनोरंजन करते हैं. जो लोग खुश होते हैं, वे अपनी इच्छा से पैसे दे देते हैं, जिससे उनकी आजीविका चलती है.
डफली की कमाई से खरीदी मोटरसाइकिल
निर्दिया गिरी ने बताया कि वर्ष 2024 में उन्होंने एक स्प्लेंडर मोटरसाइकिल भी खरीदी है. इसके लिए उन्होंने श्री राम बैंक से लोन लिया था, जिसकी किस्त वे अभी चुका रहे हैं. उनका कहना है कि यह सब संगीत के दम पर ही संभव हो पाया.
निर्दिया गिरी 1997 से लगातार बजा रहे डफली
निर्दिया गिरी ने बताया कि वे साल 1997 से लगातार डफली बजा रहे हैं. लोगों की प्रतिक्रिया पर उन्होंने कहा कि कुछ लोग तारीफ करते हैं, तो कुछ आलोचना भी करते हैं. लेकिन जो लोग खुश होते हैं, उनकी संख्या ज्यादा होती है और वही उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देती है.
अंबिकापुर में निर्दिया गिरी मुख्य रूप से महामाया मंदिर और उसके आसपास के इलाकों में गाना गाते हैं. फिलहाल वे कोठे क्षेत्र में रह रहे हैं और रोज डफली की ताल पर अपनी जिंदगी की गाड़ी आगे बढ़ा रहे हैं.
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