बेटा नहीं होने के कारण पति की प्रताड़ना भी झेली. फिर अलग हो गईं. परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने के लिए ऊषा ने करीब 20 हजार रुपये में एक ऑटो खरीदा और उसे चलाकर जीवनयापन शुरू कर दिया. शुरुआत में ऑटो से अच्छी कमाई हो जाती थी, जिससे घर का खर्च और बेटियों की पढ़ाई आसानी से चल रही थी. लेकिन, समय के साथ अब कमाई कम हो गई है. बताती हैं स्थिति बहुत खराब हो चली है.
वजह गंभीर पर हार नहीं मानूंगी…
ऊषा ने बताया, ऑटो ड्राइवरों की खराब स्थिति की सबसे बड़ी वजह शहर में ई-रिक्शा का चलन बढ़ना है. इसका ऑटो चालकों की सवारी पर सीधा असर पड़ा. ऊपर से बेरोजगारी और आर्थिक मंदी के कारण लोगों के पास खर्च करने के लिए पैसे कम हो गए. ई-रिक्शा एक-दो सवारी में भी चल देता है, लेकिन ऑटो तो तभी चलेगा, जब इतनी सवारी हो, जिससे डीजल खर्च तक निकल आए. इसके बावजूद ऊषा हार मानने को तैयार नहीं हैं. वे आज भी मेहनत कर रही हैं, ताकि अपनी बेटियों को आत्मनिर्भर बना सकें.
महिलाओं ने मांगा था रोजगार
ऑटो चालक उषा ने लोकल 18 को बताया, उनकी आर्थिक स्थिति कभी मजबूत नहीं रही. उस समय शहर में ऋतू सेन कलेक्टर थीं और राज्य में रमन सिंह का कार्यकाल था. उस दौर में बड़ी संख्या में महिलाएं बेरोजगार थीं. घरेलू हालात खराब थे और कई महिलाएं अपने पतियों की प्रताड़ना झेल रही थीं. बच्चों का पालन-पोषण भी मुश्किल हो गया था, जिसके चलते महिलाओं ने संगठित होकर रोजगार की मांग उठाई.
20000 देकर ऑटो खरीदा
उसी समय महिलाओं को रोजगार देने की पहल की गई. कचरा प्रबंधन जैसे कार्यों से लेकर परिवहन के क्षेत्र तक महिलाओं को जोड़ा गया. कुछ महिलाओं को ऑटो खरीदने का अवसर मिला. उषा ने बताया, उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार 20 हजार रुपये डाउन पेमेंट देकर ऑटो खरीदा, जबकि कुछ महिलाओं को बिना किसी डाउन पेमेंट के भी यह सुविधा मिली.
शुरू के दो साल बढ़िया थे…
उषा के अनुसार, शुरुआती वर्षों में हालात बेहतर थे. रोज की कमाई संतोषजनक थी. परिवार का खर्च चल जाता था. लेकिन, बीते दो साल से स्थिति लगातार बिगड़ती चली गई है. ई-रिक्शा के बढ़ते चलन से सड़कों पर गाड़ियों की संख्या बढ़ गई है, बेरोजगारी भी बढ़ी है और इसका सीधा असर ऑटो चालकों की आमदनी पर पड़ा है. कई बार तो डीजल का खर्च निकालना मुश्किल हो जाता है.
ये पेशा नहीं, एकमात्र सहारा
वर्तमान स्थिति पर दुख जताते हुए उषा कहती हैं कि दिन भर में कई बार एक भी सवारी नहीं मिलती. सुबह-शाम रेलवे स्टेशन पर घंटों इंतजार करना पड़ता है. ई-रिक्शा चालक कम सवारी लेकर भी निकल जाते हैं, जबकि ऑटो का खर्च ज्यादा होता है. उषा का कहना है कि घर की मजबूरी, बच्चों की पढ़ाई और आर्थिक तंगी ने उन्हें यह काम करने के लिए मजबूर किया. यह उनके लिए सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि परिवार को संभालने का एकमात्र सहारा है.
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