गरीबी बनी सबसे बड़ी चुनौती
आदिवासी अंचल सरगुजा में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, कमी है तो केवल संसाधनों की. आर्थिक रूप से कमजोर परिवार अपने बच्चों को बुनियादी शिक्षा के अलावा ज्यादा कुछ नहीं दे पाते. ऐसे में खेल जैसे क्षेत्र में आगे बढ़ना किसी चुनौती से कम नहीं. इसके बावजूद इन बेटियों ने हालात से समझौता नहीं किया और सीमित संसाधनों में भी नियमित अभ्यास जारी रखा.
राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में सरगुजा की ऐतिहासिक जीत
उच्च शिक्षा विभाग द्वारा राजनांदगांव में आयोजित राज्य स्तरीय महिला बास्केटबॉल प्रतियोगिता में सरगुजा सेक्टर की टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए प्रथम स्थान हासिल किया. इस दौरान टीम ने दुर्ग और रायपुर सेक्टर जैसी मजबूत टीमों को पराजित किया. यह उपलब्धि सरगुजा जिला बास्केटबॉल संघ के लिए ऐतिहासिक मानी जा रही है.
नेशनल और इंटरनेशनल लेवल तक पहुंची बेटियां
इस टीम की कई खिलाड़ी पहले ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा साबित कर चुकी हैं. प्रज्ञा मिश्रा अब तक 8 नेशनल और 1 इंटरनेशनल मुकाबला खेल चुकी हैं. रिबिका लकड़ा 7–8 नेशनल और 1 इंटरनेशनल प्रतियोगिता में हिस्सा ले चुकी हैं. साक्षी तिर्की 5 नेशनल मुकाबले खेल चुकी हैं।प्रीति मिंज भी नेशनल और यूनिवर्सिटी लेवल पर सरगुजा का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं. इन बच्चियों के नाम लगातार नई उपलब्धियां जुड़ती जा रही हैं.
टैलेंट सर्च कार्यक्रम बना वरदान
सरगुजा की इन प्रतिभाओं को निखारने में “टैलेंट सर्च कार्यक्रम” की अहम भूमिका रही है. यह कोई सरकारी योजना नहीं, बल्कि शहर के जागरूक नागरिकों और खेल प्रेमियों के सहयोग से चलाया जा रहा अभियान है. इसके तहत खिलाड़ियों को निशुल्क ग्राउंड, कोचिंग और जरूरी संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं.
कोच राजेश प्रताप सिंह की मेहनत और समर्पण का रिजल्ट
बास्केटबॉल कोच राजेश प्रताप सिंह ने बताया कि यह कार्यक्रम वर्ष 2016 में शुरू किया गया था।उन्होंने कहा,शुरुआत में फंड की भारी कमी थी. तत्कालीन कलेक्टर आर. प्रसन्ना के सहयोग से कार्यक्रम को गति मिली। आज सरगुजा बास्केटबॉल संघ और शहर के गणमान्य लोगों के सहयोग से हम बच्चों की मदद कर पा रहे हैं. हमारा लक्ष्य गांवों में छिपी प्रतिभाओं को पहचानकर उन्हें खिलाड़ी बनाना है.
रिबिका लकड़ा खेती से इंटरनेशनल कोर्ट तक का सफर
मैनपाट की रहने वाली रिबिका लकड़ा ने लोकल 18 को बताया कि उन्होंने 2013 में बास्केटबॉल खेलना शुरू किया. पापा किसान हैं, मम्मी हाउसवाइफ हैं। शुरुआत में बहुत परेशानी हुई, लेकिन घर वालों ने हर हाल में सपोर्ट किया। संघर्ष बहुत टफ है, लेकिन आगे बढ़ने के लिए एडजस्ट करना पड़ता है.
प्रीति मिंज मैनपाट से नेशनल लेवल तक सफर
प्रीति मिंज लोकल 18 से बातचीत में कहती हैं,मैं मैनपाट से हूं और अंबिकापुर में कॉलेज करती हूं। पांच साल से बास्केटबॉल खेल रही हूं। नेशनल और यूनिवर्सिटी गेम खेल चुकी हूं। पापा किसान हैं, लेकिन उन्होंने कभी मेरा हौसला नहीं टूटने दिया.
साक्षी तिर्की सब्जी दुकान से स्टेट चैंपियन तक
अंबिकापुर के पटेलपारा की साक्षी तिर्की बताती हैं कि पापा सब्जी बेचते हैं. बाहर खेलने जाना मुश्किल होता है, लेकिन मैनेज करना पड़ता है। डर, चोट, जूते फिसलना-बहुत सारी दिक्कतें आईं, लेकिन कोच राजेश सर ने शुरू से बहुत सपोर्ट किया.
प्रज्ञा मिश्रा इंटरनेशनल अनुभव ने बदली सोच
प्रज्ञा मिश्रा ने लोकल 18 को बताया कि इंटरनेशनल लेवल पर खेलने का अनुभव बहुत अलग होता है. वहां सुविधाएं और स्पोर्ट्स सपोर्ट बहुत अच्छा है. इंडिया में भी अगर ऐसा सपोर्ट मिले तो कई खिलाड़ी आगे जा सकते हैं.
संघ और समाज का सहयोग बना संबल
टीम मैनेजर रजत सिंह के अनुसार, कई खिलाड़ियों की आर्थिक स्थिति कमजोर है. संघ अपनी क्षमता के अनुसार उनकी मदद करता है. राज्य स्तरीय जीत पूरे सरगुजा के लिए गर्व का विषय है.
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