{कमला चौधरी ऑर्गन डोनेशन काउंसलर
अस्पताल से फोन आते ही दिल थम-सा जाता है। पता होता है कि मैं ऐसे परिवार के पास जा रही हूं, जिसने अभी किसी प्रियजन को खोया है। ट्रेनिंग मिलती है, लेकिन असली परीक्षा उस कमरे में होती है, जहां परिवार गहरे दुख में होता है। ब्रेन डेड घोषित करने से पहले डॉक
सबसे मुश्किल होता है सच स्वीकार करवाना
कई परिवार मानते ही नहीं कि उनका अपना ब्रेन डेड है। वे कहते हैं- दिल धड़क रहा है, शरीर गर्म है। तब समझाना पड़ता है कि यह सब वेंटिलेटर की वजह से है। कोमा से इंसान लौट सकता है, लेकिन ब्रेन डेड व्यक्ति कभी नहीं लौटता।
कुछ लोग जल्दी समझ जाते हैं, खासकर ग्रामीण इलाकों के, पर कई बार गुस्सा और अविश्वास भी झेलना पड़ता है। नेत्रदान के लिए लोग आगे आते हैं, लेकिन पूर्ण अंगदान के लिए सहमति अब भी कठिन है। परिवारों को शरीर की चीर-फाड़ का डर होता है, जबकि सम्मानपूर्वक एक चीरे में सर्जरी होती है और शरीर सिलकर सौंप दिया जाता है। हमारी टीम एंबुलेंस को सजाकर सम्मान से शव घर पहुंचाती है।
कुछ घटनाएं दिल में बस गईं
18 साल की लड़की के पिता ने कहा-मेरी बेटी देशभक्त थी, जीवित देश के लिए कुछ न कर सकी, पर उसके अंग दूसरों की जिंदगी बचा लें।
पहला केस भी याद है, 7 साल का बच्चा था
परिवार तैयार हुआ, लेकिन मां बोली थी- बस मेरे बच्चे का कलेजा घर लौटा देना। दिल दान नहीं हो पाया, पर बाकी अंगों से कई जिंदगियां बचीं। यह राजस्थान का पहला डोनर था
– मोहित कुमार।
मेरा काम उम्मीद जगाना है। हर ‘हां’ किसी को नई जिंदगी देती है- यही मेरा सच है।
-जैसा ईशा सिंह को बताया
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