सेक्टर-150 में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज की मौत के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गिरफ्तारी के दौरान सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के उल्लंघन को गंभीर मानते हुए सख्त फैसला सुनाया है। कोर्ट ने हैबियस कॉर्पस रिट में याचिकाकर्ता अभय कुमार को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि गिरफ्तारी के समय अरेस्ट मेमो की क्लॉज-13 का पालन नहीं किया गया, जो कानूनन अनिवार्य है। इसके बाद बृहस्पतिवार देर रात अभय कुमार को रिहा कर दिया गया।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ एवं न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया में हुई लापरवाही न केवल संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। बल्कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय किए गए सुरक्षा मानकों के भी खिलाफ है।
एमजेड विजटाउन के निदेशक और याचिकाकर्ता अभय कुमार की ओर से हाईकोर्ट में हैबियस कॉर्पस याचिका दाखिल की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया कि पुलिस ने उन्हें अवैध रूप से गिरफ्तार किया और गिरफ्तारी के समय आवश्यक कानूनी औपचारिकताओं का पालन नहीं किया गया। याचिका में यह भी कहा गया कि उनकी गिरफ्तारी, हिरासत और न्यायिक रिमांड को अवैध घोषित किया जाए।
हाईकोर्ट ने मामले पर सुनवाई के दौरान पाया कि यह प्रकरण हाल ही में दिए गए फैसले उमंग रस्तोगी बनाम राज्य सरकार से पूरी तरह आच्छादित है। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी की वैधानिक प्रक्रिया का पालन न किया जाना गंभीर चूक है और ऐसी स्थिति में आरोपी की निरुद्धि को वैध नहीं ठहराया जा सकता।
न्यायालय ने यह भी कहा कि पुलिस को गिरफ्तारी के समय पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। यदि गिरफ्तारी के नियमों का पालन नहीं होता है तो ऐसी गिरफ्तारी कानून की नजर में टिक नहीं सकती। इससे पहले सीजेएम कोर्ट ने सोमवार को अदालत ने आरोपी को राहत देने से इनकार कर दिया था।
रिमांड का आदेश अवैध करार दिया
कोर्ट ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) गौतमबुद्धनगर द्वारा पारित दिनांक 20 जनवरी 2026 और 21 जनवरी 2026 के रिमांड आदेशों को भी अवैध करार दिया। अभय कुमार के अधिवक्ता रिंकू तोंगड़ ने बताया कि न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब गिरफ्तारी ही अवैध है, तो उसके आधार पर दिया गया रिमांड आदेश भी स्वतः अवैध माना जाएगा।
खंडपीठ ने आदेश दिया कि संबंधित प्राधिकारी याचिकाकर्ता को तत्काल रिहा करें। साथ ही अदालत ने राज्य सरकार के अपर सरकारी अधिवक्ता को निर्देश दिया कि इस आदेश को बिना प्रमाणित प्रति की प्रतीक्षा किए तुरंत संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाया जाए, ताकि किसी भी प्रकार की देरी न हो।
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