यह गुरुकुल न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि सीमांचल से लेकर नेपाल तक के छात्रों के लिए ज्ञान केंद्र बन गया है. मधुबनी, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, झंझारपुर, सीतामढ़ी और नेपाल के विभिन्न जिलों से 20 से अधिक छात्र यहां आवासीय रूप से रहकर अध्ययन कर रहे हैं. बच्चों के रहने की व्यवस्था पर्यटन विभाग द्वारा निर्मित भवनों में की गई है, जबकि भोजन और आवश्यक संसाधन मुख्यतः आचार्य द्वारा…
गुरुकुल में वर्तमान में नौ ब्रह्मचारी छात्र आचार्य शंभुनाथ शास्त्री के सान्निध्य में कठोर अनुशासन, वैदिक दिनचर्या और संस्कृत अध्ययन का पालन करते हुए शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं. इन सभी के दिन की शुरुआत ब्रह्ममुहूर्त में चार बजे उठकर योग, व्यायाम, संध्या वंदन और मंत्रोच्चार की शुरुआत के साथ होती है. यहां वेद, वेदांग, व्याकरण, ज्योतिष, श्रीमद्भागवत गीता, पुराण, नीति, न्यायशास्त्र और कर्मकांड का व्यवस्थित अध्ययन कराया जा रहा है. आचार्य के अनुसार, वसुधैव कुटुंबकम और विश्व कल्याण का भाव इन ग्रंथों का मूल सार है और वर्तमान परिदृश्य में इन शिक्षाओं की प्रासंगिकता और बढ़ गई है.
यह गुरुकुल न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि सीमांचल से लेकर नेपाल तक के छात्रों के लिए ज्ञान केंद्र बन गया है. मधुबनी, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, झंझारपुर, सीतामढ़ी और नेपाल के विभिन्न जिलों से 20 से अधिक छात्र यहां आवासीय रूप से रहकर अध्ययन कर रहे हैं. बच्चों के रहने की व्यवस्था पर्यटन विभाग द्वारा निर्मित भवनों में की गई है, जबकि भोजन और आवश्यक संसाधन मुख्यतः आचार्य द्वारा किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों से प्राप्त दक्षिणा और ग्रामीण सहयोग से पूरे किए जाते हैं. आठ वर्षीय शिवम कुमार झा कहते हैं कि यहां रहकर ऐसा महसूस होता है मानो वे ऋषियों की भूमि पर शिक्षा ग्रहण कर रहे हों. दरभंगा के छात्र हर्ष और सत्यम बताते हैं कि अब वैदिक शिक्षा के लिए वाराणसी जैसे दूरस्थ स्थानों पर जाने की आवश्यकता नहीं रही.
ग्रामीण समाज भी इस पहल को सनातन संस्कृति के पुनर्जीवन का सशक्त प्रयास मान रहा है. ग्रामीण सुनील कुमार और अशोक कुमार का मानना है कि यदि प्रशासनिक और सामाजिक सहयोग मिला तो यह गुरुकुल आने वाले समय में बिहार-नेपाल क्षेत्र का प्रमुख वैदिक शिक्षा केंद्र बन सकता है. मान्यता के लिए निरंतर प्रयास जारी है. महंत जनार्दन दास ने गुरुकुल संचालन के लिए स्थान उपलब्ध कराकर एक जीवंत परंपरा को पुनर्जीवित करने का मार्ग प्रशस्त किया है. यह पहल केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है बल्कि भारतीय संस्कृति, वैदिक परंपरा और सनातन को भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण संकल्प बन गई है.
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