Sitamarhi Ajab Gajab News: सीतामढ़ी के पुरंदाहा राजवाड़ा पश्चिमी पंचायत में प्रशासनिक लापरवाही से कई बुजुर्गों को मृत घोषित कर पेंशन रोक दी गई. मामला तब सामने आया जब महीनों तक पेंशन न आने से परेशान बुजुर्ग बैंक पहुंचे और वहां पता चला कि उनके रिकॉर्ड में वे ‘मृत’ दर्ज हैं. प्रभावितों में जोत देवी, उनके पति गोनू महतो, जयवीर पासवान और राजकुमारी देवी जैसे 60 से 70 वर्ष की उम्र के बुजुर्ग शामिल हैं. जिनके लिए 400–500 रुपये की मासिक पेंशन ही जीवन का सहारा थी. डीएम कार्यालय में शिकायत पहुंची.
पेंशन लेने पहुंचे तो मृत पाए गए?
मामला तब सामने आया जब महीनों तक पेंशन न आने से परेशान बुजुर्ग बैंक पहुंचे और वहां पता चला कि उनके रिकॉर्ड में वे ‘मृत’ दर्ज हैं. प्रभावितों में जोत देवी, उनके पति गोनू महतो, जयवीर पासवान और राजकुमारी देवी जैसे 60 से 70 वर्ष की उम्र के बुजुर्ग शामिल हैं. जिनके लिए 400–500 रुपये की मासिक पेंशन ही जीवन का सहारा थी. उसी रुपये से दवा, राशन और बुनियादी जरूरतें पूरी होती थीं. पर अब हालात यह हैं कि ठंड की सर्द रातों में यह लोग दाने-दाने के लिए तरस रहे हैं. आंखों में आंसू और दिल में दर्द लिए ये बुजुर्ग जब कहते हैं. देखिए साहब, मैं जिंदा हूं… लेकिन कागज पर मुझे मरा लिख दिया गया है. तो उनकी मासूम पीड़ा हर संवेदनशील दिल को झकझोर देती है.
जीवित होने का सबूत लेकर भटक रहे
पीड़ित बुजुर्ग अब अपने जीवित होने का सबूत लेकर भटक रहे हैं. हाथों में आधार कार्ड, वोटर आईडी और बैंक पासबुक लिए वे प्रखंड कार्यालय के चक्कर लगा रहे हैं, अधिकारियों से न्याय की गुहार लगा रहे हैं. वहीं पंचायत सचिव की इस लापरवाही पर स्थानीय लोगों में आक्रोश है. लोगों का कहना है कि यह सिर्फ गलती नहीं बल्कि गंभीर प्रशासनिक अपराध है, जिसके लिए जिम्मेदार कर्मी पर धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज होना चाहिए. ग्रामीणों का कहना है कि यदि गरीबों और बुजुर्गों से जुड़ी योजनाओं के साथ इस तरह खिलवाड़ होगा, तो सरकारी भरोसा कैसे कायम रहेगा? यह सिर्फ पेंशन बंद होने का मुद्दा नहीं, बल्कि गरीबों के अधिकार छिनने और मानवीय संवेदनाओं के मरने का मामला है.
वहीं समाज कल्याण विभाग के अधिकारी जांच की बात कह रहे हैं. दावा किया जा रहा है कि मामले को गंभीरता से लिया गया है. शिकायत डीएम कार्यालय तक पहुंच चुकी है और जल्द सुधार का आश्वासन दिया जा रहा है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि तब तक इन बुजुर्गों का क्या होगा, जिनकी रोजमर्रा की ज़िंदगी इसी पेंशन पर टिकी थी? यह घटना न केवल बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, बल्कि यह भी बताती है कि यदि जिम्मेदार कर्मचारी संवेदनहीन हो जाएं तो सरकारी योजनाएं सहारा बनने के बजाय दर्द का कारण बन जाती हैं. फिलहाल इन बुजुर्गों की निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं, उम्मीद है न्याय मिलेगा और कागजों की ‘मौत’ मिटाकर उन्हें फिर से ज़िंदगी का सहारा लौटाया जाएगा.
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मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें
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