सरगुजा जिला के कोटछाल गांव के किसान की कहानी
देवनाथ हर साल सीमित रकबे में लहसुन की खेती करते हैं, लेकिन कम जमीन के बावजूद उन्हें अच्छा उत्पादन और मुनाफा मिल जाता है. खास बात यह है कि उन्होंने खेती में न तो किसी वैज्ञानिक की सलाह ली और न ही रासायनिक खाद का इस्तेमाल किया. पूरी फसल सिर्फ देसी गोबर खाद और पारंपरिक तरीकों से तैयार की गई है.
दिसंबर में की बुवाई, मजबूत रही शुरुआत
देवनाथ बताते हैं कि उन्होंने दिसंबर महीने में लहसुन की बुवाई की थी. सबसे पहले खेत में अच्छी तरह गोबर खाद डालकर जुताई की गई, ताकि मिट्टी उपजाऊ बन सके. इसके बाद लहसुन की कलियों की बुवाई की गई. शुरुआत से ही पौधों की बढ़वार अच्छी रही, जिससे फसल को लेकर उम्मीदें भी बढ़ गईं.
सामान्य देखभाल से तैयार हो रही फसल
कुछ दिनों बाद जब पौधे अच्छे से जम गए, तो खेत में निराई-गुड़ाई की गई. समय-समय पर सिंचाई की जाती रही. देवनाथ का कहना है कि इसके बाद किसी खास देखभाल की जरूरत नहीं पड़ी. फिलहाल खेत में लहसुन के छोटे-छोटे पौधे लहलहा रहे हैं और फसल धीरे-धीरे तैयार हो रही है.
अप्रैल में होगी खुदाई
मौजूदा स्थिति को देखकर देवनाथ का अनुमान है कि अप्रैल महीने में लहसुन की खुदाई की जाएगी. मौसम भी फिलहाल फसल के अनुकूल बना हुआ है, जिससे उत्पादन अच्छा होने की उम्मीद है.
घर की जरूरत से शुरू हुई खेती
देवनाथ बताते हैं कि शुरुआत में उन्होंने लहसुन की खेती सिर्फ घर की जरूरतों को पूरा करने के लिए की थी. बाजार से लहसुन खरीदना महंगा पड़ता था, लेकिन अब खुद उगाने से घरेलू खर्च में काफी बचत हो रही है.
बड़े पैमाने पर हो सकती है अच्छी कमाई
किसान का कहना है कि अगर लहसुन की खेती बड़े स्तर पर की जाए और सही तरीके अपनाए जाएं, तो इससे अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है. इस बार उनकी लागत बेहद कम रही, क्योंकि बीज घर का ही इस्तेमाल किया गया. कुछ लहसुन खाने के लिए रखे जाएंगे और बाकी अगली खेती के लिए बीज के रूप में सुरक्षित रखे जाएंगे.
खेती के सहारे बच्चों का भविष्य
देवनाथ कहते हैं कि वे बचपन से खेती कर रहे हैं. खुद पढ़ाई नहीं कर सके, लेकिन चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छी शिक्षा पाएं. खेती से होने वाली आमदनी बच्चों की पढ़ाई में बड़ा सहारा बन रही है.
कुएं और पंप से सिंचाई की सुविधा
देवनाथ के पास खुद का कुआं है और सिंचाई पंप के जरिए खेतों में पानी दिया जाता है. पानी की कोई दिक्कत नहीं होने से फसल भी अच्छी होती है और किसान का हौसला भी मजबूत बना रहता है.
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