घर की इकलौती बेटी को संयम पथ पर विदा करते समय दादी, माता-पिता, चाचा-चाची और भाई सभी भावुक नजर आए। इस अवसर पर परंपरा के अनुसार घर की दीवार पर लिखा गया कि दासी नहीं, रानी बनने जा रही हूं। इसके बाद सांसारिक सुखों की तमाम चीजों को ठुकराते हुए संतोष घर से बाहर के लिए रवाना हुई।
बीकॉम तक पढ़ी हैं संतोष
संतोष ने बताया कि उन्होंने बीकॉम तक पढ़ाई की है और आगे एमकॉम करने का सपना था, लेकिन कोरोना काल में आचार्य भगवन्त के बाड़मेर चातुर्मास के बाद उनके जीवन को नई दिशा मिली। पहले दीक्षा के भाव मन में नहीं थे, लेकिन तपस्या करना उन्हें अच्छा लगता था। संतोष ने बताया कि 4 साल के वैराग्य काल में गुरुकुल वास आठ महीने का है। इस दौरान उन्होंने करीब दो हजार किलोमीटर का पैदल विहार किया और तप, तपस्या व साधना आदि की।
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उनका कहना है कि सांसारिक जीवन में दिखने वाला सुख क्षणिक होता है, जबकि वास्तविक सुख केवल संयम में ही है। सोशल मीडिया केवल दिखावा है, असली कुछ नहीं, इसके लिए लोग उसपर जुड़े रहते हैं। युवाओं को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि जीवन में दीक्षा ग्रहण करे या न करे, लेकिन एक अच्छे सावक-सेविका जरूर बने। संतोष ने बताया कि वे 5 मार्च को जैसलमेर में खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवन्त श्री जिनमणिप्रभ सूरीश्वरजी मारासाजी के करकमलों से दीक्षा ग्रहण करेंगी। अंत में मुमुक्षु संतोष ने कहा कि सभी लोग उन्हें इतना आशीर्वाद जरूर दें ताकि उनका संयम जीवन सफल और सुखमय हो।
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