Samastipur News: समस्तीपुर के कापन में अशोक राम, दिलीप राम और संतोष कुमार ने अपने पिता स्वर्गीय रामप्रताप राम के निधन के बाद मृत्युभोज न करने का फैसला लिया. यह निर्णय आसान नहीं था, क्योंकि समाज के रूढ़िवादी तबके ने उनकी आलोचना भी की. बावजूद इसके तीनों भाई अपने फैसले पर अडिग रहे. उन्हें सम्मान समारोह में ‘आइकॉन’ के रूप में सराहा गया.
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समस्तीपुर: बिहार में इन दिनों मृत्युभोज की परंपरा तेजी से फैलती जा रही है. किसी परिजन के निधन के बाद बड़े पैमाने पर भोज का आयोजन अब सामाजिक दबाव और दिखावे का रूप ले चुका है. गरीब और मध्यम वर्ग के परिवार कर्ज लेकर भी यह रस्म निभाने को मजबूर हो जाते हैं. यह परंपरा न केवल आर्थिक बोझ बढ़ाती है, बल्कि समाज में गलत संदेश भी देती है. हालांकि अब तस्वीर धीरे-धीरे बदलती नजर आ रही है. समाज के भीतर से ही कुछ जागरूक लोग इस कुरीति के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं और मृत्युभोज के बहिष्कार का साहसिक निर्णय ले रहे हैं.
पिता के निधन पर मृत्युभोज का बहिष्कार, साहसिक फैसला समस्तीपुर जिले के विभूतिपुर प्रखंड के कापन वार्ड संख्या-1 में ऐसा ही एक प्रेरणादायक उदाहरण सामने आया है. खोकसाह्य वार्ड-17 निवासी अशोक राम, दिलीप राम और संतोष कुमार ने अपने पिता स्वर्गीय रामप्रताप राम के निधन के बाद मृत्युभोज न करने का फैसला लिया. यह निर्णय आसान नहीं था, क्योंकि समाज के रूढ़िवादी तबके ने उनकी आलोचना भी की. बावजूद इसके तीनों भाई अपने फैसले पर अडिग रहे. उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि सच्ची श्रद्धांजलि दिखावे के भोज से नहीं, बल्कि जीवन भर माता-पिता की सेवा और उनके संस्कारों को आगे बढ़ाने से होती है.
सम्मान समारोह में समाज ने दिया बदलाव का संदेश
इस साहसिक फैसले के बाद कापन में एक सम्मान समारोह का आयोजन किया गया. जिसमें मृत्युभोज का बहिष्कार करने वाले भाइयों को सम्मानित किया गया. कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व मुखिया मनीषा देवी और शिक्षक शीतल पासवान ने संयुक्त रूप से की, जबकि संचालन शिक्षक राजाराम महतो और प्रेमचंद्र सिंह ने किया. वक्ताओं ने कहा कि मृत्युभोज एक सामाजिक कुरीति है, जिसे समाप्त करना समय की मांग है. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि मृत्युभोज निषेध अधिनियम के तहत यह कानूनन अपराध की श्रेणी में आता है. अशोक, दिलीप और संतोष को समाज ने एक ‘आइकॉन’ के रूप में स्वीकार करते हुए संदेश दिया कि बदलाव की शुरुआत साहसिक फैसलों से होती है. यह पहल न सिर्फ समस्तीपुर बल्कि पूरे बिहार के लिए एक सकारात्मक और प्रेरणादायक संदेश बनकर उभरी है.
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