लुधियाना की सड़कें रविवार सुबह एक ऐतिहासिक जोश की गवाह बनीं। रन फॉर ह्यूमैनिटी मैराथन में शहरवासियों ने साबित कर दिया कि जब बात इंसानियत की हो तो लुधियाना का दिल सबसे बड़ा है। इस दौड़ का दोहरा मकसद था, संसाधनों के अभाव में शिक्षा से दूर बच्चों की मदद करना और दुनियाभर में फैल रही जंग की आग के बीच शांति का पैगाम देना। मैराथन की शुरुआत घुमार मंडी से हुई और फाउंटेन चौक पर जाकर संपन्न हुई। सुबह 5 बजे ही लोग जुटना शुरू हो गए थे। देखते ही देखते पूरा रूट जोश से भरे लोगों से भर गया। इस दौड़ में केवल युवा ही नहीं बल्कि नन्हें बच्चों से लेकर 70 साल के बुजुर्गों तक ने हिस्सा लेकर यह साबित किया कि सेवा की कोई उम्र नहीं होती। वैश्विक तनाव के बीच शांति की पुकार मैराथन के दौरान लोगों के बीच चर्चा का एक बड़ा विषय दुनिया के मौजूदा हालात भी रहे। आयोजकों और दौड़ने वाले लोगों ने विशेष रूप से ईरान और इराक के बीच बढ़ते तनाव और युद्ध जैसी स्थितियों पर चिंता व्यक्त की। कहा कि, जब दुनिया के एक हिस्से में युद्ध की लपटें उठ रही हों तब दूसरे हिस्से से शांति और इंसानियत की आवाज बुलंद करना और भी जरूरी हो जाता है। लुधियाना की यह दौड़ उन निर्दोष लोगों के साथ एकजुटता दिखाने का भी एक जरिया है जो युद्ध की मार झेल रहे हैं। सिर्फ दौड़ नहीं, एक उम्मीद है यह कार्यक्रम के दौरान आयोजकों ने स्पष्ट किया कि यह केवल शारीरिक तंदुरुस्ती के लिए की गई दौड़ नहीं थी। उन्होंने कहा कि जिंदगी का सबसे बड़ा मकसद दूसरों के लिए जीना है। आज लुधियाना की सड़कों पर वही संदेश फैलाया गया है। यह मैराथन उन बच्चों के लिए एक उम्मीद की किरण है जिनके हाथों में किताबों की जगह मजबूरी है। हर व्यक्ति का एक कदम किसी बच्चे का भविष्य बदलने की ताकत रखता है। टीम 1699 और दसवंत फाउंडेशन की अनूठी पहल जसदेव सिंह सेखों ने जानकारी देते हुए बताया कि ‘टीम 1699’ और ‘दसवंत फाउंडेशन’ की इस साझी पहल का असली लक्ष्य इंसानियत को हर सरहद और विवाद से ऊपर रखना था। उन्होंने कहा लुधियाना हमेशा से सेवा और भाईचारे में अग्रणी रहा है। दौड़ना तो एक बहाना था असली मकसद लोगों को एक मंच पर लाना था ताकि हम समाज और दुनिया को एक बेहतर कल की दिशा में ले जा सकें।
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