रामकृष्ण डालमिया ने 1930 के दशक में रोहतास के डेहरी में शुगर, सीमेंट, पेपर और केमिकल फैक्ट्रियों की स्थापना कर भारत के सबसे बड़े औद्योगिक समूहों में से एक बनाया. वित्तीय घोटाले, श्रमिक आंदोलन और प्रशासनिक असफलताओं से 1984 में उद्योग दिवालिया हो गया और आज फैक्ट्रियां वीरान हैं.
रामकृष्ण डालमिया का जीवन संघर्ष और किस्मत की अद्भुत कहानी से भरा था. जवान उम्र में पिता की मृत्यु हो जाने के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई. कलकत्ता आए जहां उनके चाचा मोतीलाल झुनझुनवाला के पास चांदी के व्यापार में काम शुरू किया. छोटे सौदे और बही-खाता संभालना उनके शुरुआती अनुभव बने.

कहते हैं कि जब सफलता दूर दिखती है तो इंसान किस्मत पर भरोसा करता है. डालमिया ने पंडित मोतीलाल बियाला से अपनी हाथ की रेखा दिखाई. पंडित ने कहा, ‘अगले डेढ़ महीने में तेरी किस्मत का ताला खुलेगा और तू एक लाख रुपये कमाएगा.’ संयोग से चांदी की डील में उन्हें डेढ़ लाख रुपये का लाभ हुआ जो आज के लगभग ढाई करोड़ के बराबर था. यही सफलता उन्हें बड़े व्यवसाय की राह पर ले गई.

1932 में डालमिया ने पटना के बिहटा में साउथ बिहार शुगर मिल्स लिमिटेड की स्थापना की. जल्द ही उनकी नजर रोहतास जिले के सोन नदी किनारे बसे गांवों पर पड़ी. यहां उन्होंने रोहतास इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाई और शुगर मिल के अलावा सीमेंट, पेपर, केमिकल, साबुन और डालडा की फैक्ट्रियों की स्थापना की. 3800 एकड़ में फैले इस औद्योगिक कस्बे ने देश के औद्योगिक मानचित्र पर अपनी चमक बनाई.
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1938 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सीमेंट फैक्ट्री का उद्घाटन किया और 1939 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने पेपर फैक्ट्री का शुभारंभ किया. डालमियानगर में स्कूल, कॉलेज, रेलवे, पावर हाउस और निजी हवाई अड्डा भी स्थापित किया गया. इस औद्योगिक टाउनशिप ने पांच दशकों तक समृद्धि और नवाचार का प्रतीक बना रहा.

रामकृष्ण डालमिया ने अपने जीवन में छह शादियां कीं और उनकी एक बेटी रमा का विवाह डालमिया-जैन समूह के संस्थापक साहू शांति प्रसाद जैन से हुआ. जैन और उनके परिवार के शामिल होने के बाद समूह का नाम बदलकर डालमिया-जैन समूह हो गया. समूह ने सीमेंट, पेपर, इंश्योरेंस, कोल्ड स्टोरेज, ऑटोमोबाइल और एसबेस्टस तक विस्तार किया. उन्होंने भारत बैंक लिमिटेड भी खोला जिसकी 292 शाखाएं देशभर में थीं.

1960 के दशक में डालमिया-जैन समूह पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे. तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सुप्रीम कोर्ट के जज विवियन बोस की अध्यक्षता में जांच कमेटी बनाई. सांसद फिरोज गांधी ने भी आरोप उजागर किए. वहीं श्रमिक आंदोलन और बिहार में जातीय हिंसा ने उद्योग की स्थिति और बिगाड़ दी. 5 जुलाई 1984 को रोहतास इंडस्ट्रीज दिवालिया घोषित कर ताले पड़ गए.

कहते हैं कि एक दिन डालमिया के ड्राइवर ने अपनी परेशानी बताई तो डालमिया ने तुरंत आठ कमरे का मकान बनवा दिया. यह बस एक झलक है उस वैभव की जिसे आज खाली फैक्ट्रियां और वीरान गलियां याद दिलाती हैं.