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Rishikesh Ganga Aarti: ऋषिकेश का पूर्णानंद घाट महिलाओं द्वारा संपन्न गंगा आरती के लिए खास माना जाता है. यह आरती न केवल आस्था का प्रतीक है बल्कि नारी सम्मान, समानता और सशक्तिकरण का संदेश भी देती है. यहां महिलाएं पूरी जिम्मेदारी संभालती हैं, हवन से लेकर आरती तक, और प्रत्येक दीया न केवल प्रकाश फैलाता है बल्कि महिला शक्ति की कहानी भी बयां करता है.
ऋषिकेश: उत्तराखंड के ऋषिकेश को योग, ध्यान और आध्यात्मिक चेतना की भूमि माना जाता है, जहां गंगा केवल नदी नहीं बल्कि जीवन की धारा है. इसी पावन नगरी में स्थित पूर्णानंद घाट एक ऐसी मिसाल पेश करता है, जो परंपरा और परिवर्तन को एक साथ जोड़ती है. यहां होने वाली गंगा आरती इसलिए विशेष है क्योंकि इसकी पूरी जिम्मेदारी महिलाओं के हाथों में है. यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि नारी सम्मान, समानता और सशक्तिकरण का सशक्त प्रतीक बन चुकी है. जब सूर्य अस्त होता है और गंगा तट पर दीपों की रोशनी फैलती है, तब यह दृश्य समाज को एक गहरा संदेश देता है कि आस्था के हर मंच पर महिलाओं की बराबर भागीदारी जरूरी है.
बेहद खास है पूर्णानंद घाट में होने वाली आरती
लोकल 18 के साथ बातचीत के दौरान संचालक ज्योति शर्मा ने बताया कि पूर्णानंद घाट पर होने वाली गंगा आरती भारत में अपने आप में एक अनोखी पहचान रखती है. इसे देश का पहला ऐसा घाट माना जाता है, जहां गंगा आरती महिलाओं द्वारा संपन्न कराई जाती है. यहां आरती की शुरुआत शाम 6:30 बजे होती है, लेकिन उससे पहले हवन का आयोजन किया जाता है. इस हवन में किसी भी वर्ग, उम्र या लिंग का व्यक्ति भाग ले सकता है, जिससे यह घाट समावेशिता और समान अधिकारों का भी प्रतीक बनता है. हवन के दौरान वैदिक मंत्रों की गूंज और जलती अग्नि वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देती है.
महिला सशक्तिकरण की मिसाल है पूर्णानंद घाट
आरती के समय महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में, हाथों में दीपक और मुख पर आत्मविश्वास के भाव के साथ गंगा मां की आराधना करती हैं. हर दीया केवल प्रकाश नहीं फैलाता बल्कि नारी शक्ति की कहानी भी कहता है. यह दृश्य भावनाओं को छू लेने वाला होता है, जब श्रद्धा और आत्मसम्मान एक साथ नजर आते हैं. लंबे समय तक धार्मिक अनुष्ठानों में महिलाओं की भूमिका सीमित मानी जाती रही है, लेकिन पूर्णानंद घाट इस सोच को बदलने का काम कर रहा है.
यह गंगा आरती समाज को स्पष्ट संदेश देती है कि आस्था और अधिकार में महिला और पुरुष समान हैं. यहां महिलाएं केवल सहभागी नहीं बल्कि नेतृत्व की भूमिका में होती हैं. मंत्रोच्चारण से लेकर आरती के संचालन तक हर जिम्मेदारी महिलाएं स्वयं निभाती हैं. इससे न केवल महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ता है बल्कि देखने और शामिल होने वाले लोगों की सोच में भी सकारात्मक बदलाव आता है.
श्रद्धालुओं के लिए खास अनुभव
इस घाट की एक और खास बात यह है कि यहां आए सभी श्रद्धालुओं को आरती करने का अवसर दिया जाता है. चाहे वह स्थानीय निवासी हों या दूर-दराज से आए पर्यटक, हर कोई इस आध्यात्मिक अनुभव का हिस्सा बन सकता है. यह पहल लोगों को जोड़ने और सामूहिक सहभागिता को बढ़ावा देती है.
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सीमा नाथ पांच साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. शाह टाइम्स, उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम किया है. वर्तमान में मैं News18 (नेटवर्क18) के साथ जुड़ी हूं, जहां मै…और पढ़ें
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