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Ramadan 2026: इस्लाम में शब-ए-क़द्र को सबसे पवित्र और बरकत वाली रात माना गया है. कुरान में भी इस रात का जिक्र करते हुए कहा गया है कि “लैलतुल क़द्र हजार महीनों से बेहतर है” हजार महीने यानी करीब 83 साल 4 महीने होता है. यही वजह है कि रमज़ान के आखिरी दस दिनों में मुसलमान खास तौर पर इबादत में ज्यादा समय बिताते हैं. कई लोग पूरी रात जागकर नमाज़ पढ़ते हैं, तस्बीह करते हैं और कुरान पढ़ते हैं. शब-ए-कद्र रात में की गई सच्चे दिल से दुआ कबूल होती है और इंसान की तकदीर तक बदल सकती है.
Ramadan 2026: पवित्र महीने रमजान में एक ऐसी खास रात आती है, जिसे नसीब बदलने वाली और इबादत की सबसे ताकतवर रात माना जाता है. इस रात को शब-ए-कद्र कहा जाता है. मान्यता है कि इस एक रात में की गई इबादत का सवाब लगभग 83 साल की इबादत के बराबर मिलता है, इसलिए दुनिया भर के मुस्लिम रोजेदार इस रात को जागकर नमाज, दुआ और कुरान की तिलावत करते हैं.
इस्लामिक धर्म में शब-ए-क़द्र को सबसे पवित्र और बरकत वाली रात माना गया है. कुरान में भी इस रात का जिक्र करते हुए कहा गया है कि “लैलतुल क़द्र हजार महीनों से बेहतर है” हजार महीने यानी करीब 83 साल 4 महीने होता है. यही वजह है कि रमज़ान के आखिरी दस दिनों में मुसलमान खास तौर पर इबादत में ज्यादा समय बिताते हैं ताकि यह बरकत वाली रात नसीब हो सके. बाड़मेर शहर के प्रमुख मस्जिदों में लोग देर रात तक इबादत करते हैं.
रमजान के आखिरी 10 दिन करते हैं अधिक इबादत
बाड़मेर के इंद्रा कॉलोनी स्थितआयशा मस्जिद के पेश ईमाम हाफिज मुनव्वर अली कादरी बताते हैं कि रमज़ान के आखिरी दस दिनों में मुसलमान ज्यादा से ज्यादा इबादत करते हैं क्योंकि माना जाता है कि शब-ए-क़द्र इन्हीं रातों में से किसी एक में आती है. खास तौर पर 21वीं, 23वीं, 25वीं, 27वीं और 29वीं रात को लोग ज्यादा इबादत करते हैं. इन रातों के तहत मस्जिदों में नमाज़, कुरान की तिलावत और दुआ का खास माहौल रहता है.
गुनाहों की माफी मांगकर पूरी रात करते है इबादत
कई लोग पूरी रात जागकर नमाज़ पढ़ते हैं, तस्बीह करते हैं और कुरान पढ़ते हैं. शब-ए-कद्र रात में की गई सच्चे दिल से दुआ कबूल होती है और इंसान की तकदीर तक बदल सकती है. कादरी के मुताबिक, इस रात में मुसलमान अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं और बेहतर भविष्य की दुआ करते हैं.
नसीब या बरकत वाली रात के लिए करते हैं इबादत
मुनव्वर अली कादरी के मुताबिक, शब-ए-क़द्र को रहमत, बरकत और मग़फिरत की रात भी कहा जाता है. यही कारण है कि रमज़ान के अंतिम दिनों में मस्जिदों और घरों में इबादत का माहौल और ज्यादा बढ़ जाता है. लोग कोशिश करते हैं कि यह बरकत वाली रात उनसे छूट न जाए, क्योंकि अगर यह रात नसीब हो जाए तो एक रात की इबादत का सवाब कई दशकों की इबादत के बराबर मिल जाता है.
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दीप रंजन सिंह 2016 से मीडिया में जुड़े हुए हैं. हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, ईटीवी भारत और डेलीहंट में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 2022 से News18 हिंदी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. एजुकेशन, कृषि, राजनीति, खेल, लाइफस्ट…और पढ़ें
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