टोंक में मंत्रीजी मंच पर चढ़े तो सामने मुद्दा खड़ा हो गया। कागज लहराते हुए युवक ने कहा- आजादी के बाद से ये समस्या है। झालावाड़ में एसडीएम साहब ने सूंघकर चावल की क्वालिटी का पता लगा लिया। जयपुर में नोटों की गड्डी पर माइक्रो सेकेंड्स में बाइक सवार युवकों की नीयत खराब हो गई। राजस्थान की राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में…
1. मंच पर मंत्रीजी, सामने खड़ा मुद्दा
मंत्रीजी को गुपचुप निरीक्षण करने का शौक है। जोधपुर के एक स्कूल में प्रार्थना चल रही थी। टीचर्स की आंखें बंद, विद्यार्थियों की आंखें बंद, हेड मास्टर साहब की आंखें बंद। व्यवस्थाएं चेक करने मंत्रीजी दबे पांव प्रार्थना में सबसे पीछे चलते हुए पहुंच गए।
लेकिन जब आम आदमी सरकार का निरीक्षण करते उतरता है तो दबे पैर नहीं आता। वह सामने आकर चीखता-चिल्लाता है। सीना ठोककर अपनी बात रखता है। टोंक में ऐसे ही जांबाज नागरिक को देख मंत्रीजी भी हक्के-बक्के रह गए।
हुआ यूं कि मंत्रीजी टोंक में स्वच्छता ही सेवा कार्यक्रम में पहुंचे थे। बार-बार ‘स्वच्छता’ और ‘सेवा’ की बात सुनकर एक ग्रामीण भड़क उठा। उसके हाथ में कुछ दस्तावेज ज्ञापन की शक्ल में थे।
वह सभा के बीच से लगभग ललकारता हुआ मंच के ठीक सामने आ गया। मंत्रीजी भी अपनी जगह से उठकर मंच के किनारे आ गए।
ग्रामीण का गुस्सा फूटा- आजादी के बाद से हमारे गांव में सड़क नहीं है। रास्ते पर कीचड़ भरा रहता है। बच्चे कीचड़ से होकर स्कूल जाते हैं। बताओ उनका क्या कसूर है।
मंत्रीजी की बोली नहीं निकली। ग्रामीण फिर बोला- यहां कांग्रेस के भी नेता बैठे हैं। पूछो इनसे, क्या हमारे गांव से एक भी वोट हमने इनको दिया है? सारे वोट आपको देते हैं। फिर भी काम नहीं बना।
मंत्रीजी से कुछ बोलते न बना। बस, पास खड़े अधिकारी को दस्तावेज लेकर मामला देखने को कहा।
टोंक में स्वच्छता ही सेवा कार्यक्रम के दौरान ग्रामीण रामस्वरूप शिक्षा मंत्री मदन दिलावर से बात करते हुए।
2. पलक झपकते ही गड्डी गायब
नीयत खराब होने में कितना समय लगता है? हम कहते हैं कि माइक्रो सेकेंड भी नहीं लगते। जयपुर में बाइक सवार दो लड़कों ने यह बात साबित कर दी।
हुआ यूं कि एक महिला, बेटी के साथ खरीदारी करने मार्केट में घूम रही थी। सड़क के उस पार से इस पार आ रही थी। इस दौरान महिला के कपड़ों से 50 हजार की नोट की गड्डी खिसककर बीच सड़क गिर गई।
मां-बेटी चार कदम ही चली होंगी कि पीछे से बाइक पर आ रहे दो लड़कों की नजर गड्डी पर पड़ गई। बाइक चालक ने जान की परवाह किए बिना खींच के ब्रेक मार दिए।
इतनी जोर से ब्रेक मारे कि पिछले टायर की दिशा पूरब से ईशान कोण हो गई। पीछे बैठा लड़का गड्डी लपकने को तैयार था ही। वह कूदकर गड्डी पर झपटा।
तब तक महिला को समझ आ चुका था कि वह नोटों की गड्डी उसी की है। मां-बेटी लड़कों की तरफ दौड़ीं, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। लड़के गड्डी लेकर फरार हो गए।
नोटों का बंडल देख कुछ सेकेंड में नीयत इतनी खराब? लगता है घर से ही खराब नीयत लेकर निकले थे।

जयपुर के बरकत नगर में बारां निवासी महिला के सड़क पर गिरे रुपए उठाकर बाइक सवार दो लड़के फरार हो गए।
3. अन्नपूर्णा रसोई में इंद्रियों की परीक्षा
अन्नपूर्णा रसोई में अफसरों की इंद्रियों की परीक्षा हो गई। पहले तो बता दें कि आंख, नाक, कान, जीभ और त्वचा ये सब 5 इंद्रियां हैं। कुछ लोग छठी इंद्री का इस्तेमाल भी कर लेते हैं। वह इंद्री सहज बोध कहलाती है।
अब मुद्दे पर आते हैं। बात झालावाड़ की है। झालावाड़ एसडीएम अभिषेक चारण अन्नपूर्णा रसोई का रियलिटी चेक करने पहुंच गए। उन्होंने वहां गर्म पानी में उबले आलुओं के कुछ अंश देखे। थोड़ा सा तेल डाल देने के कारण इस घोल का रंग सब्जी जैसा पीला हो गया था। एसडीएम साहब ने चमचे से बाल्टी में भरी सब्जी को घोला। फिर चिल्लाए- ये कोई सब्जी है? क्या घर में ही ऐसी ही सब्जी खाते हो?
रसोई संचालक सकते में आ गए। इसके बाद महोदय ने दूसरे बर्तन को खींचा। इसमें कुछ ठोस सा दिखने वाला नरम खाद्य पदार्थ रखा था। एसडीएम साहब ने इसे चमचे में भरा और नाक तक लेकर आए। उन्होंने सूंघकर कहा- ये चावल हैं? किस क्वालिटी के चावल हैं? ऊपर से ठंडे हैं। साहब खूब तमतमाए और संचालक पर बरसते हुए रसोई बंद करने की चेतावनी दे डाली।
दूसरा किस्सा टोंक का है। यहां कलेक्टर मैडम भोजन चेक करने पहुंचीं थीं। उन्होंने भोजन चखा। तीखा लगा। पसीने आए। भौंहें चढ़ गईं। लेकिन बोलीं- भोजन तो ठीक है। संचालक चतुर। कहीं तीखी सब्जी पर सवाल न उठ जाए। लिहाजा शब्दों में मिठास घोलते हुए बोला- मैडम यहां मथानिया मिर्ची खाते हैं। इधर बहुत मशहूर है।

झालावाड़ में एसडीएम अभिषेक चारण ने सूंघकर चावल की क्वालिटी बता दी। रसोई बंद करने की चेतावनी दी। टोंक में कलेक्टर कल्पना अग्रवाल ने भोजन चखकर क्लीन चिट दी।
4. चलते-चलते..
‘सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अंग विभूषणं’…तुलसीदासजी ने जिस मनोभाव से रामजी के लिए ये पंक्तियां लिखीं। वैसा ही मनोभाव जयपुर में हुई शादी में आने वाले कई खास मेहमानों ने कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय के लिए जाहिर किया।
राजस्थान में इतनी शाही शादियां होती हैं, भव्यता की पराकाष्ठा ही हो जाती है, किसी देश से फूल आते हैं, किसी देश से कलाकार, पूरा बॉलीवुड मखमली कालीनों पर ठुमकने के लिए उमड़ पड़ता है।
लेकिन जयपुर में कथावाचक महाराज की शादी के अलग ही रंग दिखे। बड़े-बड़े महात्मा एयरपोर्ट पर दिखे। बड़े-बड़े संत मंगलाचरण करते आ रहे हैं। वृंदावन से प्रेमानंदजी महाराज की शिष्याएं राधा-रानी की सखियों जैसे पहुंच रही हैं।
सभी के माथे पर तिलक है। सभी के गले में तुलसी की कंठियां हैं। चारों ओर होम-हवल की सुगंधित धुआं है। संस्कृत के श्लोकों की धारा बह रही है। भजनों पर नृत्य हो रहे हैं। सूरज की साक्षी में फेरे और बड़े-बड़े संतों के पगफेरे।
रामकथा करने वाले पहुंचे हैं। हनुमान कथा करने वाले पहुंचे हैं। इस शादी को देख मालूम पड़ा कि विवाह एक धार्मिक रस्म है। सिर्फ नाच-गाना और रुपयों का दिखावा कर सात जन्म के बंधन में बंधना शाही शादी नहीं। खरी बात तो यही है कि जहां संस्कार शाही हों, वही शादी शाही है।

जयपुर में कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय के विवाह की रस्में।
वीडियो देखने के लिए ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल मुलाकात होगी…
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