राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने माध्यमिक शिक्षा विभाग में हेडमास्टर और प्रिंसिपल के पदों पर पदोन्नति के लिए रिव्यू डीपीसी आयोजित नहीं करवाने के मामले में सरकार को फटकार लगाई है। जस्टिस रेखा बोराणा की कोर्ट ने 12 मार्च को अवमानना याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार के रवैये को स्पष्ट रूप से लापरवाही पूर्ण माना है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि यदि 25 मार्च तक आदेश की मूल भावना के अनुरूप पालना रिपोर्ट पेश नहीं की जाती है, तो शिक्षा विभाग के प्रमुख शासन सचिव और माध्यमिक शिक्षा निदेशक को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित होना होगा। इस संबंध में चूरू के रतनगढ़ निवासी राजेंद्र कुमार और बाड़मेर के बायतू निवासी शांति चौधरी ने एडवोकेट देवकीनंदन व्यास के माध्यम से अलग-अलग अवमानना याचिकाएं दायर की थीं। मई 2023 में आदेश, फिर भी नहीं की पालना एडवोकेट देवकीनंदन व्यास ने बताया कि यह विवाद 12 मई 2023 और 19 मई 2023 को पारित आदेशों की पालना न होने से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने अगस्त 2023 में हेडमास्टर या प्रिंसिपल के पद पर अपना तीन साल का अनुभव पूरा कर लिया था। अनुभव पूरा होने के बाद, उन्होंने उसी महीने प्रतिवादी अधिकारियों के समक्ष अपना रिप्रेजेंटेशन प्रस्तुत किया। कोई कार्रवाई नहीं होने पर सितंबर 2023 में एक रिमाइंडर भी दिया गया और एक नोटिस भी सर्व किया गया। कोई कदम नहीं उठाए जाने पर मार्च 2024 और फरवरी 2023 में ये यह अवमानना याचिकाएं दायर की गईं। 8 सप्ताह का समय और हाजिरी माफी का आवेदन इससे पहले 22 जनवरी और 14 जनवरी 2026 को दिए गए आदेशों में कोर्ट ने प्रतिवादियों को आदेश की पालना करने के लिए 8 सप्ताह का समय दिया था। उस आदेश में यह शर्त थी कि यदि पालना नहीं होती है, तो माध्यमिक शिक्षा निदेशक को कोर्ट के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना पड़ेगा। गुरुवार को हुई सुनवाई में अतिरिक्त महाधिवक्ता की ओर से अधिकारी की व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट प्राप्त करने के लिए एक आवेदन पेश किया गया। सरकारी वकील ने तर्क दिया कि चल रही प्रशासनिक प्रक्रियाओं और आधिकारिक व्यस्तताओं के कारण निदेशक व्यक्तिगत रूप से अदालत के समक्ष उपस्थित होने में असमर्थ हैं। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि ऐसी किसी आधिकारिक व्यस्तता का कोई विवरण प्रस्तुत नहीं किया गया है। कार्मिक विभाग से अनुमोदन का तर्क कोर्ट में सरकारी वकील ने तर्क दिया कि प्रतिवादी कोर्ट के आदेश की पालना करने की प्रक्रिया में हैं। उन्होंने बताया कि 7 मार्च के पत्राचार के माध्यम से रिव्यू डिपार्टमेंटल प्रमोशन कमेटी (डीपीसी) बुलाने के लिए कार्मिक विभाग से अनुमोदन मांगा गया है। जैसे ही अनुमोदन प्राप्त होगा, उसे राजस्थान लोक सेवा आयोग (आरपीएससी) को भेज दिया जाएगा और उसके बाद रिव्यू डीपीसी बुलाने के लिए एक तारीख तय की जाएगी। कोर्ट की टिप्पणी: 8 सप्ताह की मोहलत थी, पत्र अब लिखा सरकारी वकील के तर्कों पर कोर्ट ने कहा कि आठ सप्ताह का समय दिए जाने के बावजूद, प्रतिवादी नंबर 2 (माध्यमिक शिक्षा निदेशक) द्वारा पहला पत्राचार महज कुछ दिन पहले 7 मार्च 2026 को ही किया गया है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि प्रतिवादियों का यह रवैया स्पष्ट रूप से अवमाननापूर्ण है और राज्य के अधिकारी अदालत के आदेशों का पालन न करने पर आमादा हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि वर्ष 2023 में आदेश पारित होने के बावजूद आज तक रिव्यू डीपीसी नहीं बुलाई गई है और अधिकारी इस मामले को बहुत हल्के में ले रहे हैं। 25 मार्च तक का अंतिम अवसर, वरना दंड कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 25 मार्च तय की है। साथ ही निर्देश दिया है कि यदि इस तारीख तक आदेश की मूल भावना के अनुरूप पालना रिपोर्ट दाखिल नहीं की जाती है, तो शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव को अदालत के समक्ष उपस्थित होकर यह समझाना होगा कि उनके खिलाफ सजा के आदेश क्यों न पारित किए जाएं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि अगली तारीख तक रिपोर्ट दाखिल नहीं होती है, तो शिक्षा विभाग के निदेशक को भी अदालत के समक्ष उपस्थित रहना होगा और उस दिन उनके खिलाफ उचित दंडात्मक आदेश पारित किए जाएंगे। इसके साथ ही कोर्ट ने व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट के आवेदन को निस्तारित कर दिया है।
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