राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के एक मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए चित्तौड़गढ़ स्पेशल जज के आदेश को रद्द कर दिया है। जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू ने आदेश पास करते हुए ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि आरोपी को मूल डिजिटल रिकॉर्डिंग की हैश वैल्यू सहित क्लोन कॉपी उपलब्ध कराई जाए। दरअसल, जयपुर के 20 रघुविहार, महारानी फार्म निवासी किशन अग्रवाल के खिलाफ एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) चित्तौड़गढ़ पुलिस स्टेशन से भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज है। चित्तौड़गढ़ की विशेष न्यायालय (स्पेशल जज, प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट कोर्ट) में केस नंबर चल रहा है। इस मामले में आरोपी-याचिकाकर्ता किशन अग्रवाल ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष दो आवेदन दिए थे। पहले आवेदन में रिश्वत की कथित मांग की मूल रिकॉर्डिंग की क्लोन कॉपी और हैश वैल्यू मांगी गई थी। दूसरे आवेदन में जब्त राशि की फर्द, घटना की फोटो, वीडियोग्राफी और संपूर्ण बातचीत की रिकॉर्डिंग मांगी गई थी। चित्तौड़गढ़ स्पेशल जज ने 1 सितंबर 2025 को दोनों आवेदन खारिज कर दिए। जिसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने राजस्थान हाईकोर्ट में पेटिशन दायर की। याचिकाकर्ता के तर्क: चार्जशीट के साथ मूल साक्ष्य नहीं याचिकाकर्ता की ओर से वकील ने कोर्ट में तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष के मुताबिक रिश्वत की मांग की तीन अलग-अलग बातचीत डिजिटल वॉइस रिकॉर्डर पर रिकॉर्ड की गई थी, लेकिन न तो कोई डिजिटल वॉइस रिकॉर्डर और न ही कोई मूल रिकॉर्डिंग डिवाइस की क्लोन कॉपी चार्जशीट के साथ दाखिल की गई। वकील ने तर्क दिया कि आरोपी को जो सीडी और ट्रांसक्रिप्ट दिया गया है, वह मनमाना तरीके से बनाया गया है और मूल रिकॉर्डिंग से मेल नहीं खाता। वकील ने यह भी तर्क दिया कि हैश वैल्यू सहित मूल मीडिया डिवाइस की क्लोन कॉपी मिलने से ही आरोपी रिकॉर्ड की प्रामाणिकता जांच सकता है और प्रभावी बचाव कर सकता है। सरकारी वकील की दलील: सभी दस्तावेज दिए प्रतिवादियों की ओर से सरकारी वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी को कानून के अनुसार सभी दस्तावेज पहले ही उपलब्ध करा दिए गए हैं। सरकारी वकील ने तर्क दिया कि मूल रिकॉर्डिंग डिवाइस और क्लोन कॉपी की मांग इस स्तर पर अनुचित और गलत है, इसलिए याचिका खारिज की जाए। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पूर्व फैसले निर्णायक कोर्ट ने पाया कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के प्रकटीकरण और आरोपी के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट तथा इस हाईकोर्ट के कोऑर्डिनेट बेंच के स्पष्ट निर्णय उपलब्ध हैं। संदर्भ फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मेमोरी कार्ड/पेनड्राइव की सामग्री “दस्तावेज” है और अभियोजन पक्ष यदि उस पर निर्भर करता है, तो आरोपी को उसकी क्लोन कॉपी मिलना जरूरी है। कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट व अन्य राज्यों के कुछ अन्य संदर्भ फैसलों का भी हवाला दिया, जिनमें कहा गया था कि निष्पक्ष सुनवाई के लिए सामग्री का उचित प्रकटीकरण संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी का मूल अधिकार है। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की क्लोन कॉपी तक पहुंच से वंचित करना निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन है। कोर्ट का फैसला: नया दस्तावेज नहीं मांगा, प्रमाणित प्रति दें कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की महत्ता और इससे संबंधित कानूनी सिद्धांतों की सही तरह से सराहना नहीं की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता ने कोई नया दस्तावेज नहीं मांगा, बल्कि केवल उस सामग्री की प्रमाणित प्रति मांगी है जिसे अभियोजन पक्ष अपने मामले के समर्थन में उपयोग करना चाहता है। कोर्ट ने कहा कि हैश वैल्यू के बिना इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की प्रामाणिकता की जांच संभव नहीं है और ऐसे में आरोपी का प्रभावी बचाव करना असंभव हो जाता है। इसी आधार पर जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू ने चित्तौड़गढ़ स्पेशल जज के 1 सितंबर 2025 के आदेश को रद्द करते हुए ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि आरोपी किशन अग्रवाल को मूल डिजिटल रिकॉर्डिंग की हैश वैल्यू सहित क्लोन कॉपी दी जाए। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मूल डिजिटल वीडियो रिकॉर्डर को मंगवाने, अन्य दस्तावेजों और सीडी में कथित हेरफेर के मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं की जाएगी। ये मुद्दे ट्रायल के दौरान उचित स्तर पर तय होंगे और याचिकाकर्ता उचित समय पर नया आवेदन देने के लिए स्वतंत्र है।
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