पंडित मनोज शुक्ला के अनुसार, मऊर सौपनें की रस्म शादी में कुल तीन बार निभाई जाती है. पहली बार यह तब किया जाता है, जब बेटा बारात लेकर निकलता है. उस समय घर की सभी बड़ी महिलाएं मां, दादी, चाची, बड़ी मां, बुआ, मौसी और मामी दूल्हे के माथे पर दोनों हाथ रखकर आशीर्वाद देती हैं कि उसका वैवाहिक जीवन सुख, समृद्धि और सौभाग्य से भरा रहे. इस दौरान वातावरण में खुशी, उत्साह और मंगल गीतों की गूंज होती है.
दूसरी बार यह परंपरा तब निभाई जाती है, जब कन्या पक्ष से दुल्हन विदा होती है. इस समय दूल्हा और दुल्हन दोनों का मऊर सौपा जाता है. कन्या पक्ष की बुजुर्ग महिलाएं लड़की को आशीर्वाद देकर उसके नए जीवन की मंगलकामना करती हैं कि वह अपने ससुराल में प्रेम, सम्मान और सुख के साथ जीवन बिताए. इसी तरह दूल्हे को भी आशीर्वाद दिया जाता है कि वह अपनी पत्नी का स्नेहपूर्वक साथ निभाए और दोनों मिलकर एक समृद्ध परिवार की नींव रखें. यह पल भावनाओं से भरा होता है, जहां विदाई के आंसू और आशीर्वाद का प्रेम एक साथ दिखाई देता है.
नए जीवन की शुभ शुरुआत का प्रतीक
तीसरी बार मऊर सौपने की परंपरा तब निभाई जाती है, जब दूल्हा-दुल्हन अपने घर पहुंचते हैं. ससुराल पहुंचते ही परिवार की महिलाएं नवदंपति का स्वागत आशीर्वाद से करती हैं. इस रीत का उद्देश्य यह है कि नवविवाहित जोड़े को परिवार की स्वीकृति, स्नेह और सुरक्षा का भाव मिल सके. यह आशीर्वाद उनके नए जीवन की शुभ शुरुआत का प्रतीक माना जाता है.
पंडित मनोज शुक्ला बताते हैं कि मऊर सौपनें का अर्थ केवल हाथ माथे पर रखना नहीं है बल्कि यह एक आध्यात्मिक आशीर्वाद है, जिसमें परिवार के सभी लोगों की शुभकामनाएं समाहित होती हैं. इसे सुख, समृद्धि, संरक्षण और दांपत्य की मजबूती का संदेश माना जाता है. आज के आधुनिक समय में कई शादी की रस्में बदल चुकी हैं लेकिन मऊर सौपनें जैसी परंपराएं अभी भी पूरी गरिमा के साथ निभाई जाती हैं. यह रीत छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो परिवार, सम्मान और आशीर्वाद की भावना को पीढ़ियों से संजोए हुए है.
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