रायगढ़ जिले के तमनार में एक महिला पुलिसकर्मी से बर्बरता का वीडियो सामने आने के बाद पुलिस बल और ग्रामीणों में गम और गुस्सा है। ग्रामीणों के एक प्रतिनिधिमंडल ने कलेक्टर को ज्ञापन देकर इस घटना की निंदा की है और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है। फ
पुलिस भी बहुत संभल कर कार्रवाई कर रही है, क्योंकि आदिवासी समुदाय के लोग होने के कारण फिर कोई नया विवाद मोल नहीं लेना चाह रही। इस घटना के बाद पुलिस और प्रशासन के अफसर भी यह स्वीकार कर रहे हैं कि वे विद्रोह को भांप नहीं पाए।
जब तक खुफिया नेटवर्क बना, तब तक इतनी बड़ी घटना हो चुकी थी। पहली बार कुछ प्रदर्शनकारियों ने पेट्रोल बम का इस्तेमाल किया, इसलिए पुलिस को विद्रोह को भड़काने में बाहरी लोगों का हाथ होने की आशंका है। इस दिशा में जांच की जा रही है।
इस घटना में पुलिस के दर्जनभर स्टाफ ग्रामीणों का शिकार हुए हैं। इनमें दो टीआई, एसआई और अन्य शामिल हैं। वहीं, जिंदल के तमनार प्लांट के भी इतने ही स्टाफ घायल हुए हैं। साथ ही करीब 30-40 करोड़ का नुकसान भी हुआ है। फिलहाल पुलिस ने एक अस्थाई चौकी बनाई है, ताकि फिर प्लांट में लोग न घुसें। विरोध प्रदर्शन और हिंसा में शामिल लोग ग़ायब हो गए हैं। उनकी तलाश की जा रही है।
तमनार की घटना से निवेश को झटका तमनार की घटना ने राज्य सरकार की औद्योगिक निवेश की कोशिशों के लिए बड़ी चुनौती प्रस्तुत की है। दरअसल, औद्योगिक निवेश के लिए क़ानून व्यवस्था भी काफी महत्वपूर्ण है। ऐसी घटनाओं से निवेश करने वाली कंपनियां पीछे हटती हैं। ऐसे में शासन-प्रशासन पर यह दबाव है कि किसी भी स्थिति में व्यवस्था बहाल हो और ग्रामीणों का भरोसा वापस जीतें।
इन बिंदुओं से समझें पूरी घटना को
अफवाहों से भड़के लोग: गारे पेलमा सेक्टर-1 में ओपन कास्ट और अंडरग्राउंड माइनिंग होनी है। गांव में यह अफवाह फैल गई कि घरों के नीचे भी खोद देंगे और मुआवजा नहीं मिलेगा। दूसरा जहां मुआवजा दिया जाएगा, वहां भी चार गुना देने का प्रावधान नहीं है। इससे लोग भड़के और विरोध सुलगा।
संवाद और समन्वय नहीं: ग्रामीणों में जब नाराज़गी सामने आई, तब जिंदल प्रबंधन और प्रशासन की ओर से संवाद नहीं हुआ। अफवाहों को दूर नहीं किया गया। समन्वय का अभाव था, इसलिए धीरे-धीरे 14 गांव के लोग एकजुट होने लगे।
प्रशासन और जन प्रतिनिधियों पर अविश्वास: विरोध प्रदर्शन बढ़ता जा रहा था, लेकिन प्रशासन और जन प्रतिनिधियों पर अविश्वास के कारण ग्रामीण किसी की बात मानने के लिए तैयार नहीं हुए।
नेताओं को पकड़ा तब हिंसा: 27 दिसंबर को जब भीड़ बढ़ी तो पुलिस-प्रशासन ने आंदोलन का नेतृत्व कर रहे लोगों को पकड़ना शुरू किया, तब भीड़ उग्र होती गई। स्थानीय नेता वहां से गायब हो गए और भीड़ नेतृत्व विहीन हो गई। इसके बाद पुलिस भी स्थिति को नहीं संभाल पाई।
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