सरकारी अस्पताल में लोगों की बीमारियों को ठीक करने वाले अब खुद बीमार हो रहे हैं। एक्स-रे से मरीजों की बीमारी पहचानने वाले रेडियोग्राफरों को अब गंभीर बीमारी हो रही है।
रेडिएशन की वजह से रेडियोग्राफरों को बालों का तेजी से झड़ना, नाखूनों का कमजोर होकर गलना, कमजोरी, पेट संबंधी विकार, मोतियाबिंद, थायराइड, ट्यूमर, कैंसर, नपुंसकता, बांझपन जैसी अनुवांशिक बीमारी हो रही है। लगातार रेडिएशन के संपर्क में रहने से कई कर्मचारियों की सेहत पर घातक असर दिखने लगा है।
महिलाओं में गर्भधारण से जुड़ी जटिलताएं आम होती जा रही हैं। गौरतलब है कि प्रदेशभर के शासकीय अस्पतालों में 200 से ज्यादा रेडियोग्राफर काम कर रहे हैं। इनमें 25 फीसदी महिलाएं हैं। इनमें से हर महिला कोई न कोई गंभीर स्वास्थ्य समस्या से जूझ रही हैं।
सबसे ज्यादा स्थिति उन महिलाओं की खराब है जिन्हें लगातार रेडिएशन में काम करने के कारण गर्भपात जैसी स्थिति का भी सामना करना पड़ा है। अस्पताल के बाहर एक्स-रे कक्ष के बाहर चेतावनी लिखी होती है कि गर्भवती महिलाएं अंदर न जाएं। मरीजों के साथ आए परिजनों को भी रेडिएशन के खतरे का हवाला देकर बाहर रोक दिया जाता है।
लेकिन वहां काम करने वाली महिला कर्मचारियों को लेकर कोई सुरक्षा नहीं बरती जा रही है। गर्भावस्था के दौरान भी कई महिला कर्मियों को मशीन के पास ड्यूटी करनी पड़ती है।
सेफ्टी अलाउंस के नाम पर मिलते हैं केवल 50 रुपए रेडियोग्राफरों की सुरक्षा को लेकर सरकार और स्वास्थ्य विभाग कितने गंभीर हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रेडिएशन जैसे जानलेवा खतरे के बावजूद कर्मचारियों को रेडिएशन सेफ्टी अलाउंस के नाम पर सिर्फ 50 रुपए दिए जा रहे हैं।
यह भत्ता पिछले 27 साल से नहीं बढ़ा है। छत्तीसगढ़ प्रदेश रेडियोग्राफर प्रकोष्ठ के प्रांतीय संयोजक संतोष देवांगन ने बताया कि 1994 के बाद से न तो भत्ता बढ़ा और न ही पदनाम बदला। इसके अलावा एक माह का रेडिएशन अवकाश, पदों की संख्या में बढ़ोतरी जैसी मांगें भी अब तक पूरी नहीं हुई हैं। इसके लिए रेडिएशन संघ ने करीब 500 पत्र सरकार, मंत्री और अधिकारियों को लिख चुके हैं।
लापरवाही: बिना सेफ्टी उपकरण के काम कर रहे
कई शासकीय अस्पतालों के रेडियोग्राफरों का कहना है कि अभी भी मशीन कक्ष में लेड एप्रन, डोजीमीटर और अन्य जरूरी सेफ्टी उपकरणों की भारी कमी है। लापरवाही का ही नतीजा है कि महिलाकर्मी लगातार रेडिएशन की चपेट में आकर गर्भपात का शिकार हो रही हैं। लवन की लता साहू, बस्तर की पुष्पा नाग समेत ऐसे कई उदाहरण हैं जिन्होंने गर्भावस्था के दौरान काम किया। इस वजह से उनका मिसकैरेज हुआ।
केस-1 मैं 10 साल से रेडियोग्राफी में काम कर रही हूं। रेडिएशन से आज तक मां नहीं बन पाईं। चार बार बड़े ऑपरेशन झेलने के बाद भी मुझे मातृत्व सुख नहीं मिल पाया। इसके बाद भी न तो सरकार को हमारा ख्याल है, न ही विभाग हमारी मांगों पर ध्यान दे रहा। – छाया वर्मा, बरमकेला रायगढ़
केस-2 मैंने 10 साल रेडियोग्राफी डिपार्टमेंट में काम किया है। विवाह के एक दशक बाद भी मुझे मातृत्व प्राप्त नहीं हो सका। रेडिएशन क्षेत्र के काम से दूरी बनाने के बाद ही मैं मां बन सकीं। मुझ जैसी कई महिलाएं ऐसी स्थिति में ही हैं। इस पर ध्यान देना जरूरी है। -रानी वर्मा, बेमेतरा
राज्यभर में जितने भी रेडियोलॉजिस्ट हैं उनकी जानकारी जुटाकर जांच करेंगे। वे अभी कौन से सुरक्षा उपकरण उपयोग कर रहे ये भी पता किया जाएगा। इनके स्वास्थ्य के लिए जो भी जरूरी होगा वो अस्पतालों में उपलब्ध कराया जाएगा। सुरक्षा भत्ता कम हो तो उसे भी बढ़ाएंगे। -श्यामबिहारी जायसवाल, स्वास्थ्य मंत्री
भास्कर एक्सपर्ट – डॉ एसबीएस नेताम, रेडियो डायग्नोसिस विशेषज्ञ
खतरा तो बड़ा ही रहता है एक्सरे-सिटी स्कैन आदि में महिला रेडियोकर्मियों को पेट में शील्ड पहनकर काम करना चाहिए। ऐसा नहीं करने पर ओवरी पर असर पड़ता है। लंबे समय से काम करने वालों को इससे काफी खतरा हो सकता है। इसलिए सुरक्षा मानकों का प्रयोग कर काम करना बेहद आवश्यक है। गर्भवती महिलाओं को इससे दूर ही रहना चाहिए। आने वाले बच्चों में विकृति भी हो सकती है।
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