पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने 11 लाख रुपये से अधिक के कथित गबन के मामले में आरोपी अकाउंटेंट की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि एक ही राहत के लिए बार-बार अलग-अलग तरीके से अदालत का दरवाजा खटखटाना “फोरम शॉपिंग” है और यह न्यायिक व्यवस्था के खिलाफ है। सुनवाई के दौरान जस्टिस सुमित गोयल की पीठ ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति बिना किसी नए तथ्य या परिस्थिति के बार-बार समान राहत मांगने के लिए अदालत आता है तो यह न्याय पाने का प्रयास कम और “किस्मत आजमाने” जैसा ज्यादा लगता है। अदालत ने कहा कि बार-बार किस्मत आजमाने के तरीके से याचिका लगाना सही नहीं है और अदालत को प्रयोग करने की जगह नहीं बनाया जा सकता। निजी खाते में ट्रांसफर का आरोप मामले के अनुसार राजेश महाजन बटाला की ‘सैम इंटरनेशनल’ कंपनी में अकाउंटेंट था। कंपनी ने उसे वित्तीय और लेखा संबंधी काम की जिम्मेदारी दी हुई थी। आरोप है कि उसने कंपनी के करीब 11.15 लाख रुपये अपने निजी बैंक खाते में ट्रांसफर कर लिए और बाहरी भुगतानों के लिए जारी चेकों को भी गलत तरीके से डायवर्ट कर दिया। इसके अलावा आरोप है कि उसने कंपनी की ओर से जमा किए जाने वाले टैक्स और अन्य देनदारियां समय पर जमा नहीं कीं, जिससे कंपनी को जुर्माना और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। 2017 में दर्ज हुआ था मामला इन आरोपों के आधार पर वर्ष 2017 में बटाला के सिविल लाइंस थाना में भारतीय दंड संहिता की धारा 408 और 420 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। रिकॉर्ड के अनुसार आरोपी ने 2018 में पहली बार अग्रिम जमानत की याचिका दाखिल की थी, जिसे बाद में वापस ले लिया गया। बाद में उसे नियमित जमानत मिल गई, लेकिन महामारी के बाद वह ट्रायल कोर्ट में पेश नहीं हुआ। इसके चलते 29 मई 2023 को उसे भगोड़ा घोषित कर दिया गया। समझौते की दलील भी नहीं मानी करीब 8 साल बाद आरोपी ने फिर से अग्रिम जमानत की याचिका दायर की और कहा कि दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया है और एफआईआर रद्द कराने की याचिका भी लगाई गई है। हालांकि हाई कोर्ट ने यह दलील स्वीकार नहीं की। अदालत ने कहा कि केवल समझौता हो जाने से आरोपी के व्यवहार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जो व्यक्ति लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया से बचता रहा हो, उसे अग्रिम जमानत जैसी विशेष राहत नहीं दी जा सकती।
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