5 साल से लंबित स्टांप ड्यूटी विवाद पर पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने पंजाब के अधिकारियों के कामकाज पर गहरी नाराजगी जताते हुए कहा कि बार-बार अस्पष्ट और अधूरे आदेशों के कारण मामला आज तक लटका हुआ है। मामले की अगली सुनवाई 13 मार्च 2026 को होगी। मामले को गंभीर मानते हुए हाईकोर्ट ने पंजाब के चीफ सेक्रेटरी से खुद हलफनामा दाखिल करने को कहा है। कोर्ट ने पूछा है कि ट्रेनिंग देने का जो वादा किया गया था, वह पूरा क्यों नहीं हुआ और आगे ऐसी गलती दोबारा न हो, इसके लिए क्या कदम उठाए जाएंगे। कोर्ट ने चेतावनी दी कि संतोषजनक जवाब न मिलने पर अवमानना (कंटेम्प्ट) की कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि 2010 से चल रहा यह विवाद इसलिए हल नहीं हो पाया, क्योंकि संबंधित अधिकारियों ने बिना ठोस कारण बताए छोटे और अस्पष्ट आदेश पारित किए। कोर्ट ने 18 अगस्त 2025 को अपील अथॉरिटी द्वारा दिए गए आदेश पर भी सवाल उठाए और कहा कि उसमें तथ्यों का सही विश्लेषण नहीं किया गया और पिछले न्यायिक निर्देशों की अनदेखी की गई। कलेक्टर रेट के आधार पर फैसला नहीं हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी दस्तावेज पर केवल कलेक्टर रेट के आधार पर स्टांप ड्यूटी कम नहीं मानी जा सकती, जब तक उसके समर्थन में ठोस सबूत न हों। अदालत ने कहा कि पहले भी मामले को दोबारा विचार के लिए भेजा गया था, लेकिन वही गलती दोहराई गई। ट्रेनिंग को लेकर उठे सवाल सुनवाई के दौरान 2023 में दायर एक जनहित याचिका का जिक्र हुआ। इसमें राज्य सरकार ने कहा था कि अधिकारियों को उनकी कानूनी शक्तियों का सही इस्तेमाल करने के लिए खास ट्रेनिंग दी जाएगी। सरकार ने हलफनामे में बताया था कि बेवजह के मुकदमों को कम करने के लिए अधिकारियों को महात्मा गांधी स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में प्रशिक्षण दिया जाएगा। हालांकि रिकॉर्ड से सामने आया कि 2022 से 2026 के बीच कई प्रशिक्षण कार्यक्रम हुए, लेकिन विवादित आदेश पारित करने वाले कमिश्नर को 2015 से 2021 के बीच कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला। इस पर कोर्ट ने हैरानी जताई और पूछा कि क्वासी-ज्यूडिशियल शक्तियों का उपयोग करने वाले अधिकारियों को नियमित प्रशिक्षण क्यों नहीं दिया गया।
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