Raipur News: घनश्याम रात्रे ने लोकल 18 से कहा कि जहां खेतों में लगातार यूरिया डालने से जमीन ठोस और सख्त हो जाती है, वहीं मुर्गी की बीट वाली खाद के इस्तेमाल से मिट्टी भुरभुरी और उपजाऊ होती है.
उन्होंने आगे बताया कि पोल्ट्री फार्म से इस भूसी मिश्रित बीट को नियमित रूप से कलेक्ट कर सुरक्षित स्थान पर रखा जाता है. बाद में इसे खेतों में खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. घनश्याम रात्रे का कहना है कि जहां खेतों में लगातार यूरिया डालने से जमीन सख्त और ठोस हो जाती है, वहीं मुर्गी बीट वाली खाद के इस्तेमाल से मिट्टी भुरभुरी और उपजाऊ बनती है. मिट्टी की संरचना सुधरने से खेतों में केंचुओं की संख्या भी बढ़ती है, जो प्राकृतिक रूप से भूमि की उर्वरता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं.
उन्होंने यह भी बताया कि मुर्गी बीट खाद का उपयोग सभी प्रकार की खेती में किया जा सकता है. चाहे धान की फसल हो, सब्जियों की खेती या फिर फलदार पौधे, हर जगह इसका सकारात्मक असर देखने को मिलता है. हालांकि उन्होंने किसानों को सलाह दी कि इस खाद का उपयोग सीमित और जरूरत के अनुसार ही किया जाए क्योंकि यह डीएपी की तुलना में लगभग 10 गुना अधिक प्रभावी मानी जाती है.
3000 मुर्गियों से चार ट्रॉली खाद
घनश्याम रात्रे के अनुसार, यदि कोई किसान एक बार में लगभग 3000 मुर्गियों का पालन करता है, तो उससे करीब चार ट्रॉली खाद प्राप्त हो जाती है. इस खाद का उपयोग लगभग चार एकड़ खेत में किया जा सकता है. वह खुद करीब 7 एकड़ भूमि में खेती करते हैं और मुर्गी बीट खाद के नियमित इस्तेमाल के कारण उन्हें रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता बेहद कम पड़ती है. उत्पादन की बात करें तो घनश्याम रात्रे का दावा है कि इस जैविक खाद के उपयोग से प्रति एकड़ फसल उत्पादन में करीब 30 क्विंटल या उससे अधिक की बढ़ोतरी होती है. इससे न केवल किसानों की आमदनी बढ़ती है बल्कि पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचता है. उनका अनुभव यह दर्शाता है कि मुर्गी पालन और खेती का यह संयोजन ग्रामीण किसानों के लिए एक टिकाऊ और लाभकारी विकल्प बन सकता है.
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राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.
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