18 सितंबर को मुख्यमंत्री धामी ने खुद न्याय विभाग को नन्ही परी मामले में मजबूत पैरवी के निर्देश दिए थे. उस वक्त धामी सरकार के आश्वासन पर जनता ने आंदोलन स्थगित कर दिया था. लेकिन आज 112 दिन बीत जाने के बाद भी याचिका स्वीकार नहीं हुई है. पीड़िता के ताऊ तारा चंद का कहना है कि सरकार केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित रह गई है. उन्होंने प्रदेश की जनता से आह्वान किया है कि कशिश को न्याय दिलाने के लिए एक बार फिर सड़क पर उतरना होगा.
नन्ही परी के ताऊ तारा चंद ने साफ कहा है कि, ‘सरकार ने जिस तेजी से रिव्यू पिटीशन दाखिल करने का भरोसा दिया था, उसी तेजी से मजबूत पैरवी और आगे की कानूनी प्रक्रिया भी होनी चाहिए थी. हमें सिर्फ कागजी कार्रवाई नहीं, बल्कि असरदार पैरवी की उम्मीद थी.’ कहा कि अगर अब भी न्यायिक प्रक्रिया में ठोस प्रगति नहीं दिखी, तो आंदोलन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा. उन्होंने उत्तराखंड की जनता से एक बार फिर आंदोलन में भागीदारी की अपील की.
कांग्रेस ने नन्ही परी मामले में देरी को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला है. वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व दर्जा राज्य मंत्री महेंद्र लुंठी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ‘नन्ही परी को न्याय दिलाने के लिए अब बड़ा आंदोलन किया जाएगा. पहले भी जनता ने आंदोलन में पूरा साथ दिया है और इस बार भी सरकार से जवाब मांगने के लिए लोग सड़कों पर उतरेंगे.’ कांग्रेस ने साफ किया है कि जरूरत पड़ी तो पिथौरागढ़ बंद का आह्वान किया जाएगा और आंदोलन को राज्यव्यापी रूप दिया जाएगा.
क्या था पूरा मामला?
20 नवंबर 2014 को पिथौरागढ़ की मासूम नन्ही परी हल्द्वानी में एक विवाह समारोह के दौरान लापता हो गई थी. पांच दिन बाद गौला पार की झाड़ियों में उसका क्षत-विक्षत शव मिला. पुलिस ने बिहार निवासी ट्रक चालक अख्तर अली को गिरफ्तार किया. निचली अदालत और हाई कोर्ट ने आरोपी को फांसी की सजा सुनाई थी, लेकिन पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों के अभाव में उसे बरी कर दिया.
सुप्रीम कोर्ट में क्यों कमजोर पड़ा केस?
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को बरी करते हुए कहा था कि पुलिस द्वारा पेश किए गए सबूत केवल ‘परिस्थितिजन्य’ (Circumstantial) हैं. आरोपी की वकील मनीषा भंडारी ने दलील दी थी कि पुलिस ने जांच में घोर लापरवाही की, गिरफ्तारी की झूठी कहानी रची और DNA सैंपल्स के साथ छेड़छाड़ की गई. कोर्ट ने माना कि केवल संदेह के आधार पर किसी को फांसी नहीं दी जा सकती. पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने अख्तर अली को बरी कर दिया.
न्याय की मांग: नामकरण नहीं, सजा चाहिए
हालांकि, धामी सरकार ने नन्ही परी की याद में पिथौरागढ़ इंजीनियरिंग कॉलेज का नाम उसके नाम पर रखा है, लेकिन परिवार का कहना है कि उन्हें प्रतीकात्मक सम्मान नहीं, बल्कि बेटी के हत्यारे के लिए सजा चाहिए. अब देखना यह होगा कि धामी सरकार इस मामले में कितनी तेजी से कानूनी कदम उठाती है.
Discover more from India News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.