मरीज जब डॉक्टर के पास पहुंचता है तो उसकी पहली दवा अक्सर पर्ची पर नहीं बल्कि डॉक्टर के शब्दों में होती है-आप ठीक हो जाएंगे। यही भरोसा कई बार असहनीय दर्द से लड़ने की ताकत बन जाता है।
पीजीआई चंडीगढ़ में हुए एक शोध ने साबित किया है कि इलाज में दवा जितनी जरूरी है, उतनी ही अहम भूमिका डॉक्टर की बात और मरीज की उम्मीद निभाती है। जोड़ों के लंबे और असहनीय दर्द से जूझ रहे मरीज जब रोज दवा लेते हैं, तो वह केवल गोली नहीं खा रहे होते, बल्कि उसके साथ ठीक होने की उम्मीद भी संजोते हैं।
इंटरनल मेडिसिन विभाग के रूमेटोलॉजी डिवीजन में किए शोध में इसी मानवीय अनुभव को वैज्ञानिक रूप से परखा गया। नतीजे चौंकाने वाले रहे—जहां असली दवा नहीं दी गई, वहां भी मरीजों ने उतनी ही राहत महसूस की, जितनी दवा लेने से होती।
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