Patna Golghar News: बिहार की राजधानी पटना में स्थित गोलघर का निर्माण अनाज रखने के लिए हुआ था, लेकिन आज यह बिहार के लिए धरोहर का रूप ले चुका है. यह सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि उस दौर की भयावह त्रासदी की याद है. जब भूख ने पूरे पूर्वी भारत को झकझोर दिया था. आइये जानते हैं इसके इतिहास के बारे में.
राजधानी पटना में स्थित गोलघर का निर्माण अनाज रखने के लिए हुआ था, लेकिन आज यह बिहार के लिए धरोहर का रूप ले चुका है. यह सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि उस दौर की भयावह त्रासदी की याद है. जब भूख ने पूरे पूर्वी भारत को झकझोर दिया था. दरअसल, 1770 के विनाशकारी अकाल के बाद तत्कालीन गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स एक स्थायी समाधान की तलाश में थे. ताकि भविष्य में खाद्यान्न संकट से लोगों को बचाया जा सके. तभी गोलघर की नींव रखी गई थी.

इतिहास के पन्नों के अनुसार 20 जनवरी 1784 को खाद्यान्न कारोबारी जेपी ऑरियल ने हेस्टिंग्स को एक विशाल अन्न भंडार के निर्माण का सुझाव दिया था. इसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के बंगाल आर्मी के इंजीनियर कैप्टन जॉन गार्स्टिन को यह जिम्मेदारी सौंपी गई. गार्स्टिन ने बांकीपुर में रहकर इसकी रूपरेखा तैयार की. आज वो निवास स्थान बांकीपुर गर्ल्स हाई स्कूल के रूप में जाना जाता है. जो गोलघर के ठीक सामने ही स्थित है.

करीब ढाई साल के कठिन परिश्रम के बाद 20 जुलाई 1786 को गोलघर का निर्माण पूरा हुआ. छत्ते और स्तूप जैसी अनोखी आकृति वाला यह अन्न भंडार उस समय इंजीनियरिंग का अद्भुत प्रयोग माना गया. 29 मीटर ऊंची इस संरचना की दीवारें 3.6 मीटर मोटी हैं और इसके निर्माण में कहीं भी सीमेंट के स्तंभों का उपयोग नहीं किया गया.
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हालांकि निर्माण पूरा होते ही इसकी तकनीकी खामियां भी सामने आने लगीं. गोलघर के दरवाजे अंदर की ओर खुलते हैं. इस वजह से इसे पूरी क्षमता तक भरना संभव नहीं था. अगर इसे पूरा भर दिया जाता तो दरवाजे खुल ही नहीं सकता था. इसके अलावा भीषण गर्मी के कारण इसमें रखा गया अनाज जल्दी खराब हो जाता था. इन कमियों के चलते गोलघर कभी अपने उद्देश्य के अनुरूप इस्तेमाल नहीं हो सका.

इतिहासकारों के मुताबिक, अंग्रेजों ने बाद में इन खामियों को कैप्टन गार्स्टिन की ‘इंजीनियरिंग भूल’ करार दिया. इसके बावजूद अपनी विशालता और अनूठी बनावट के कारण गोलघर लोगों के आकर्षण का केंद्र बन गया. वैसे इसके भंडारण क्षमता करीब 1,40,000 टन आंकी गई थी, लेकिन संयोगवश इसमें कभी अनाज संग्रह नहीं किया गया.

जब गोलघर का निर्माण हुआ था. उस समय गंगा नदी बिल्कुल पास से बहती थी. इसका जिक्र अंग्रेज चित्रकार रॉबर्ट स्मिथ की एक पेंटिंग में हुआ है. इसके चारों ओर बनी 145 सीढ़ियां ऊपर तक जाती हैं. जहां से पूरे पटना शहर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है. एक समय था. जब आम पर्यटक इन सीढ़ियों के जरिए ऊपर तक जाते थे और पूरे पटना के दृश्य का आनंद उठाते थे.

हरे-भरे बाग-बगीचों के बीच स्थित यह स्मारक पिकनिक स्पॉट के रूप में भी लोकप्रिय है. 1979 में इसे राज्य संरक्षित स्मारक घोषित किया गया था. इसके अंदर से बोलने पर 27 से 32 बार तक आवाज गूंजती है. यहां होने वाला लेजर शो भी दर्शकों के द्वारा काफी पसंद किया जाता रहा है. हालांकि, निर्माण कार्य को लेकर अब आम लोग सीढ़ियों पर नहीं चढ़ सकते थे. आम लोगों के लिए अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया है.
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