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Agriculture News: प्याज की खेती में स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस का कल्चर अगर प्रिवेंटिव रूप से दो बार इस्तेमाल किया जाए, तो इस रोग से काफी हद तक बचाव किया जा सकता है. यह फायदेमंद बैक्टीरिया मिट्टी में मौजूद हानिकारक फंगस को कंट्रोल करता है और पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है.
उन्होंने आगे कहा कि ऑर्गेनिक खेती करने वाले किसानों के लिए उन्होंने प्राकृतिक और जैविक उपायों को सबसे सुरक्षित और प्रभावी बताया. उनके अनुसार, प्याज की खेती में स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस का कल्चर यदि प्रिवेंटिव रूप से दो बार उपयोग किया जाए, तो इस रोग से काफी हद तक बचाव किया जा सकता है. यह फायदेमंद बैक्टीरिया मिट्टी में मौजूद हानिकारक फंगस को नियंत्रित करता है और पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है. इसके साथ ही माइकोराइजा फंगस का प्रयोग करने से जड़ और गांठ का विकास बेहतर होता है, जिससे पौधा मजबूत बनता है और उत्पादन में वृद्धि देखने को मिलती है.
दोनों जैविक तरीकों से अच्छे परिणाम
लक्ष्मीकांत प्रधान का दावा है कि इन दोनों जैविक तरीकों को अपनाने से उन्हें अपनी फसल में काफी अच्छे परिणाम मिले हैं. वहीं जो किसान ऑर्गेनिक खेती नहीं करते हैं और रासायनिक पद्धति से खेती कर रहे हैं, उनके लिए भी समाधान मौजूद है. लक्ष्मीकांत के अनुसार, इस रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर किसी भी प्रभावी फंगीसाइड का उपयोग किया जा सकता है. विशेष रूप से रोडोमिल गोल्ड और मैनकोजेब जैसे फंगीसाइड इस बीमारी को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं.
कृषि विशेषज्ञों की सलाह जरूरी
हालांकि उन्होंने किसानों को यह भी सलाह दी कि दवाओं का छिड़काव कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार ही करें ताकि फसल और मिट्टी पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े. रोग के लक्षणों के बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि प्याज के पौधे में जब दो या तीन नए पत्ते निकलते हैं, तो उनके ऊपरी हिस्से में सफेद-सफेद धब्बे दिखाई देने लगते हैं. यदि ऐसे पौधे को खींचकर देखा जाए, तो उसमें सड़न की बदबू आती है, जो इस रोग की स्पष्ट पहचान है. यही संकेत किसानों के लिए चेतावनी है कि वे तुरंत उपचार शुरू करें.
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राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.
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