नैनीताल निवासी प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर अजय रावत बताते हैं कि, कुमाऊं अंचल में ईसाई धर्म के संगठित इतिहास की शुरुआत वर्ष 1848 से मानी जाती है. इसी वर्ष अंग्रेजों ने नैनीताल में इस चर्च का निर्माण पूरा कराया. हालांकि चर्च की नींव इससे पहले, वर्ष 1846 में रख दी गई थी. शुरुआत में यह एक पब्लिक चर्च था, जहां आम लोगों के लिए धार्मिक आयोजन और प्रार्थनाएं होती थीं, लेकिन बाद में इसे ब्रिटिश सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया.
इस वजह से पड़ा सेंट जॉन्स इन द विल्डरनेस
नैनीताल को बसाने की प्रक्रिया के साथ ही अंग्रेजों ने इसे अपने सपनों के शहर के रूप में विकसित किया. झील, पहाड़, सड़कों और इमारतों के साथ-साथ धार्मिक स्थलों का भी योजनाबद्ध तरीके से निर्माण किया गया. सेंट जॉन्स चर्च इसका जीवंत उदाहरण है. चर्च का नाम “इन द विल्डरनेस” इसलिए पड़ा क्योंकि उस समय यह इलाका घने जंगलों और झाड़ियों से घिरा हुआ था. यहां तक पहुंचना भी आसान नहीं था, लेकिन अंग्रेज अधिकारियों को यह स्थान चर्च के लिए सबसे उपयुक्त लगा.
पहली नजर में पसंद की थी जगह
इतिहास में एक रोचक तथ्य यह भी दर्ज है कि साल 1844 में कलकत्ता के बिशप डेनियल विल्सन अल्मोड़ा आए थे. अल्मोड़ा से लौटते समय वे नैनीताल में रुके, जहां उन्हें बताया गया कि इस क्षेत्र को नई बसावट के लिए चुना गया है. उस समय कुमाऊं के वरिष्ठ सहायक कमिश्नर जॉन हैलीट बैटन ने सुखाताल के पास इस स्थान को चर्च के लिए चिन्हित किया. बिशप घने जंगलों के बीच मुश्किल से यहां पहुंचे, लेकिन पहली ही नजर में उन्हें यह जगह बेहद पसंद आई और उन्होंने इसे तत्काल चर्च के स्वामित्व में ले लिया.
जिम कॉर्बेट के माता पिता की कब्र
सेंट जॉन्स चर्च परिसर के पास स्थित कब्रिस्तान भी ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है. यहां कई ब्रिटिश अधिकारियों और उनके परिजनों की कब्रें मौजूद हैं, जो उस दौर के जीवन और संघर्षों की कहानी बयां करती हैं. इसी कब्रिस्तान में प्रसिद्ध शिकारी, लेखक और पर्यावरण प्रेमी जिम कॉर्बेट के माता-पिता की कब्रें भी स्थित हैं. यही कारण है कि यह स्थान इतिहास प्रेमियों और पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. सतह ही इस चर्च पर प्रसिद्ध शिकारी जिम कॉर्बेट का बपतिस्वां हुआ था.
विशेष प्रार्थना का किया जाता है आयोजन
क्रिसमस जैसे पावन अवसर पर सेंट जॉन्स चर्च की रौनक और भी बढ़ जाती है. आज भी यहां विशेष प्रार्थनाएं आयोजित की जाती हैं और स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटक भी इस ऐतिहासिक धरोहर को देखने पहुंचते हैं. शांत वातावरण, देवदार और बांज के पेड़ों से घिरा यह चर्च मानो समय को थामे हुए है.
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