मकर संक्रांति के दिन कुमाऊं के घरों में आटे और गुड़ से बने घुघुते तैयार किए जाते हैं. इन घुघुतों को बच्चों के गले में माला की तरह पहनाया जाता है और घर-घर उल्लास का माहौल रहता है. लेकिन इस पर्व की सबसे खास परंपरा त्यौहार के अगले दिन देखने को मिलती है, जब कौए को घुघुते और मास की खिचड़ी अर्पित की जाती है. मान्यता है कि उत्तरायणी के दिन कौए गंगा स्नान कर दूसरे दिन सुबह-सुबह घरों में घुघुते और खिचड़ी खाने आते हैं. इसी आस्था के चलते लोग सुबह जल्दी उठकर छतों या आंगन में कौए के लिए प्रसाद रखते हैं.
मास की खिचड़ी खाने की खास परंपरा
मकर संक्रांति के साथ ही माघ मास का आरंभ होता है और माघ के पहले दिन मास की खिचड़ी खाने की परंपरा कुमाऊं की संस्कृति का अहम हिस्सा है. उत्तराखंड के नैनीताल निवासी प्रोफेसर ललित तिवारी बताते हैं कि माघ माह के पहले दिन खिचड़ी खाने की परंपरा सदियों पुरानी है. यह केवल भोजन नहीं, बल्कि धार्मिक प्रसाद के रूप में ग्रहण की जाती है. सूर्य देव को अर्पित करने के बाद ही खिचड़ी का सेवन किया जाता है.
इस वजह से बनाया जाता है खिचड़ी का प्रसाद
प्रोफेसर तिवारी बताते हैं कि मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं, यानी सूर्य का मार्ग दक्षिण से उत्तर की ओर हो जाता है. इसी कारण इस पर्व को उत्तरायणी कहा जाता है. धार्मिक मान्यता है कि सूर्य के उत्तरायण होने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और सूर्य का तेज बढ़ता है. इसी तेज को प्राप्त करने के लिए खिचड़ी का प्रसाद बनाया जाता है. खिचड़ी को भारतीय भोजन का एक संपूर्ण आहार माना जाता है, जिसमें दाल, चावल और मसालों के माध्यम से कई पोषक तत्व मिलते हैं, जो सर्दी के मौसम में शरीर को ऊर्जा प्रदान करते है.
ज्योतिष मान्यताएं भी जुड़ी हुई हैं
परंपराओं के पीछे ज्योतिषीय मान्यताएं भी जुड़ी हुई हैं. प्रोफेसर तिवारी के अनुसार, ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को ग्रहों का राजा माना गया है और सूर्य के पुत्र शनि देव हैं. कई लोगों की कुंडली में सूर्य दोष या शनि दोष होते हैं. इन दोषों के निवारण के लिए माघ माह में खिचड़ी का सेवन और दान शुभ माना जाता है. यही कारण है कि खिचड़ी को प्रसाद स्वरूप ग्रहण करने की परंपरा शुरू हुई. इसके साथ ही उत्तरायणी के बाद मौसम में भी बदलाव देखने को मिलता है. सूर्य के उत्तरायण होने से ठंड धीरे-धीरे कम होने लगती है और बसंत ऋतु की आहट महसूस होने लगती है.
कुमाऊं में मकर संक्रांति को उत्तरायणी, घुघुतिया त्यार जैसे कई नामों से जाना जाता है, लेकिन इसका भाव एक ही है प्रकृति, आस्था और परंपरा का उत्सव. आज भी कुमाऊं के गांवों और शहरों में उत्तरायणी के दूसरे दिन कौए के लिए घुघुते और मास की खिचड़ी रखी जाती है. यह परंपरा न केवल लोक विश्वास को दर्शाती है, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच गहरे संबंध को भी उजागर करती है. यही कारण है कि मकर संक्रांति कुमाऊं में केवल त्योहार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत के रूप में मनाई जाती है.
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