आमना सामना तो क्या करें
अगर पहाड़ों में चलते समय बाघ, लैपर्ड, भालू यां कोई भी जंगली जानवर दिखाई दे जाए तो सबसे जरूरी बात है घबराना नहीं. तेज आवाज करना, पत्थर फेंकना या अचानक भागना खतरनाक साबित हो सकता है. ऐसी स्थिति में शांत रहते हुए धीरे-धीरे पीछे की ओर हटना चाहिए और किसी सुरक्षित स्थान, जैसे घर, वाहन या ऊंचे प्लेटफॉर्म की ओर जाना चाहिए. बच्चों और बुजुर्गों को आगे न रखें और सभी लोग एक-दूसरे के साथ समूह में रहें. रामनगर निवासी वन्यजीव विशेषज्ञ संजय छिम्वाल बताते हैं कि वर्तमान समय में पहाड़ों में बाघ, लैपर्ड, भालू और हाथियों के हमलों की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं. ऐसे में लोगों को अतिरिक्त सतर्कता बरतने की जरूरत है.
जंगल में इन बातों का रखें ध्यान
संजय छिम्वाल के अनुसार, अगर जंगल जाना जरूरी हो, तो दोपहर के समय जाना ज्यादा सुरक्षित होता है. जंगल में प्रवेश से पहले आसपास के संकेतों को समझना बेहद जरूरी है. जंगली जानवर अपनी मौजूदगी गंध, पैरों के निशान, आवाज और गुर्राहट के जरिए बताते हैं. अगर ऐसे संकेत दिखें या सुनाई दें, तो तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए और आगे बढ़ने से बचना चाहिए. जंगल में कभी अकेले न जाएं. हमेशा समूह में निकलें और अपने साथ लाठी या कोई साधारण औजार रखें, ताकि जरूरत पड़ने पर खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें. अगर किसी जानवर से आमना-सामना हो जाए, तो उससे आंखों का संपर्क बनाए रखें और बिना घबराए धीरे-धीरे पीछे हटें. भागने की गलती बिल्कुल न करें, क्योंकि इससे जानवर को हमला करने का मौका मिल सकता है. अधिकतर मामलों में जानवर तुरंत हमला नहीं करते, वे पहले इंसान की प्रतिक्रिया को परखते हैं.
संजय छिम्वाल बताते हैं कि पहाड़ी इलाकों में रात के समय अकेले बाहर निकलने से बचना चाहिए. अगर निकलना जरूरी हो तो टॉर्च जरूर साथ रखें. घरों के आसपास झाड़ियां साफ रखें, खुले में कचरा न फेंकें और आवारा कुत्तों की संख्या को नियंत्रित करने की कोशिश करें, ताकि लैपर्ड गांवों की ओर आकर्षित न हों. बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष का स्थायी समाधान केवल सतर्कता से नहीं, बल्कि जंगलों के संरक्षण, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने और सामूहिक जागरूकता से ही संभव है.
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