नागौर जिले के बापोड गांव में पुश्तैनी जमीन के बंटवारे को लेकर आपसी समझ और एकता की एक अनूठी मिसाल पेश की गई है। यहां खसरा नंबर 236 की 11 बीघा जमीन, जो लंबे समय से दादा अब्दुल हकीम के नाम पर चली आ रही थी, उसे अब उनके तीन बेटों अब्दुल शकूर, गुलाम मोहम्मद और अब्दुल रसीद के परिवारों ने मिलकर कानूनी रूप से बांटने का फैसला किया है। इस जमीन पर चार पीढ़ियों का हक था, जिसके चलते कुल 24 खातेदार एक साथ नागौर तहसील कार्यालय पहुंचे।
कुम्हारी गांव के रहने वाले इन तीन भाइयों के 11 परिवारों ने तहसीलदार नरसिंह टांक के समक्ष पेश होकर बंटवारे का सामूहिक आवेदन किया। खातेदारों ने बताया कि जमीन का बंटवारा न होने की वजह से उन्हें खेती से जुड़ी सरकारी योजनाओं, केसीसी ऋण लेने और जमीन की खरीद-फरोख्त में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। पारिवारिक विवादों और कोर्ट-कचहरी के लंबे चक्करों से बचने के लिए सभी सदस्यों ने आपसी सहमति से विभाजन इकरारनामा तैयार किया। इस प्रक्रिया के लिए सभी 24 खातेदारों ने अपने आधार कार्ड, परिवार रजिस्टर की नकल, वंशावली और शपथ-पत्र जैसे जरूरी दस्तावेज पेश किए। तहसीलदार के सामने सभी पक्षों ने एक राय होकर अपनी सहमति जताई, जिससे अब तीन पीढ़ियों से चला आ रहा यह मालिकाना हक का मामला सुलझने की राह पर है। इस कदम से न केवल इन परिवारों को अपनी जमीन का स्वतंत्र अधिकार मिलेगा, बल्कि समाज में भी यह संदेश गया है कि आपसी तालमेल से बड़े से बड़े संपत्ति विवाद को आसानी से सुलझाया जा सकता है।
तहसीलदार नरसिंह टाक ने बताया कि यह सब लोग अलग अलग जगह रह रहे थे और कुछ परिवार तो दूसरे राज्यों में भी राज्य से भी बाहर रह रहे थे। जब इनसे समझाईस की तो सब एग्री हो गए। इसकी वजह से एक तो इन सबको अपनी जमीन का मालिकाना हक़ मिल गया। कोर्ट कचहरी के चक्कर भी नहीं लगाने पड़े और अब सरकारी योजनाओं का फायदा भी सबको मिलने लगेगा। सरकार की भी कोशिश है कि ऐसे मामलों को राजीनामों के जरिये ही निपटाए और उसीका यह नतीजा है।
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