छपरा मेघ गांव के रामजानकी मठ से जुड़ी परंपरा के अनुसार, यहां के तालाबों की मछलियां भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार का प्रतीक मानी जाती हैं और उनकी रक्षा की जाती है. यहां उनका शिकार करने के बदले उनको पूजा जाता है. गांव में ऐसी मान्यता है कि मछली पकड़ने पर दुर्घटना हो सकती है.
मछली को माना जाता है भगवान
ग्रामीणों के अनुसार, इस अनोखी परंपरा की जड़ें गांव में स्थित रामजानकी मठ की स्थापना से जुड़ी हैं. बुजुर्ग विजय पांडे बताते हैं कि जब मठ की स्थापना हुई, उसी समय गांव के तालाबों की मछलियों को भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार का प्रतीक मान लिया गया. इसके बाद से गांव वालों ने इन मछलियों को वही सम्मान और संरक्षण देना शुरू किया, जो भगवान विष्णु को दिया जाता है. तब से लेकर आज तक किसी ने भी इन तालाबों से मछली नहीं पकड़ी.
मछलियों को देखने उमड़ती है भीड़
यहां का नजारा भी अपने आप में अलग है. रोज़ सुबह और शाम ग्रामीण तालाब के किनारे पहुंचकर मछलियों को आटे की गोलियां और मूढ़ी खिलाते हैं. जैसे ही लोग पानी में दाना डालते हैं, मछलियां झुंड बनाकर सतह पर आ जाती हैं. यह दृश्य देखने वालों को आस्था और आश्चर्य दोनों से भर देता है. शाम ढ़लते ही तालाब का माहौल और भी रहस्यमय हो जाता है. चारों ओर सन्नाटा पसर जाता है, पानी की सतह पर हल्की-हल्की हलचल दिखती है और मछलियों की चमक अंधेरे में उभर आती है. ग्रामीणों का मानना है कि जैसे कोई अदृश्य शक्ति इन मछलियों की रखवाली कर रही हो.
मछली पकड़ने पर अपशकुन जैसी बात
गांव में यह विश्वास बसा है कि इन मछलियों को भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त है. कहा जाता है कि जो भी व्यक्ति यहां मछली का शिकार करने की कोशिश करेगा, उसके जीवन में कोई न कोई अशुभ घटना जरूर घटेगी. इस बात को कोई अंधविश्वास मानता है तो कोई आस्था, लेकिन सच्चाई यह है कि आज तक किसी ने इस मान्यता को तोड़ने की हिम्मत नहीं की.
गांव के नरेश कहते हैं, ‘बचपन से सुनते आ रहे हैं कि इन मछलियों को मारना महापाप है. इनकी रक्षा करना ही हमारे गांव का धर्म है.’ छपरा मेघ का यह तालाब आज भी आस्था और परंपरा की मिसाल बनकर खड़ा है, जहां मछलियां शिकार नहीं, बल्कि श्रद्धा और आशीर्वाद का प्रतीक हैं.