चंपावत में स्मार्टफोन आज सभी के लिए जरूरी हो गया है, लेकिन दूसरी तरफ इसकी बढ़ती लत बच्चों की नींद और मानसिक सेहत पर असर कर रही है। जिला अस्पताल में अभिभावक ऐसे बच्चों को लेकर आ रहे हैं जो मोबाइल देखने के चक्कर में कुछ याद नहीं रख पा रहे हैं। उन्हें भूख भी नहीं लगती है। हर तीन दिन में ऐसे करीब 10 मामले आ रहे हैं।
चिकित्सकों का कहना है कि देर रात तक मोबाइल चलाने की आदत के कारण बच्चों में अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, तनाव और एकाग्रता की कमी जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। मोबाइल में गेमिंग और सोशल मीडिया स्क्रॉल करने की आदत बच्चों में इस समस्या को और गंभीर बना रही है। बच्चे मोबाइल देखकर ही हंसना-रोना कर रहे हैं। कम उम्र में मोबाइल और टीवी की रोशनी से आंखों में जलन, कमजोरी और नजर की दिक्कतें भी बच्चों में बढ़ रही है। संवाद
जिला अस्पताल में बंद हैं मनोचिकित्सक की सेवाएं
जिला अस्पताल में मानसिक रोगियों को लंबे समय से मनोचिकित्सक की सेवाएं नहीं मिल पा रहीं हैं। पंजीकरण कक्ष के बाहर मनोरोग और चर्म रोग विशेषज्ञ के आने की तिथि का पता नहीं है, सूचना चस्पा की गई है।
तीन साल से कम उम्र में मोबाइल की आदत पड़ने से बच्चे चिड़चिड़े और जिद्दी हो जाते हैं। खेलने, चलने-फिरने और एक्टिव रहने से हड्डियां और मांसपेशियां मजबूत होती हैं। इस उम्र में बच्चे खेल, बातचीत और आसपास की चीजों से सीखते हैं। – डॉ. मंजूनाथ, बाल रोग विशेषज्ञ, जिला अस्पताल, चंपावत
मोबाइल फोन के ज्यादा इस्तेमाल ने बच्चों का ध्यान पढ़ाई से भटका दिया है। वह छोटी-छोटी बातों पर जल्दी गुस्सा करने लगे हैं या अक्सर चुपचाप व उदास रहते हैं। इतना ही नहीं, कुछ बच्चे कार्टून और वीडियो में दिखने वाले किरदारों की नकल करने लगे हैं, जो गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। – डॉ. दीपक सिंह रावत, फिजिशियन, जिला अस्पताल, चंपावत
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