बागेश्वर में ढोल-दमाऊं की थाप और होली के सुरों के बीच जब कोई महिला होल्यार अचानक किरदार बदलकर मंच पर आ जाती है तो माहौल ठहाकों से गूंज उठता है। यह है कुमाऊं में पीड़ियों से चली आ रही अनूठी स्वांग परंपरा। वेशभूषा से लेकर अभिनय तक इसके लिए तैयारी की जाती है।
यह कुमाऊंनी महिला होली का वह जीवंत रंग है जो गीत-संगीत में अभिनय और हास्य का तड़का लगाकर आनंद से सराबोर कर देता है। बदलते दौर में होली गायन की जगह डीजे संस्कृति का प्रभाव बढ़ा है, फिर भी ग्रामीण इलाकों में महिलाएं इस लोक परंपरा को सहेजकर आगे बढ़ा रही हैं। कुमाऊं में पारंपरिक महिला होली की लगभग हर टोली में दो-तीन महिला होल्यार स्वांग रचाने में दक्ष होती हैं। अलग-अलग पात्रों की वेशभूषा और बोलचाल की शैली अपनाकर वे गीतों के बीच मनोरंजन का ऐसा रंग भरती हैं कि पूरा माहौल जीवंत हो उठता है।
भले ही स्वांग की जड़ें हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की लोकनाट्य परंपराओं में मानी जाती हों लेकिन कुमाऊं ने इसे जीवंत स्वरूप में अपनाया है। बुजुर्ग महिला होल्यरों के अनुसार यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी देख-सीखकर आगे बढ़ी है।
स्वांग की शैली भी बदली
समय के साथ स्वांग की शैली और वेशभूषा भी बदली है। आज महिलाएं रंग-बिरंगी विग और आकर्षक चश्मों जैसी सामग्री का उपयोग करती हैं। दो-तीन दशक पहले ग्रामीण महिलाएं स्थानीय संसाधनों से ही रूप सज्जा करती थीं। मक्के की फली के रेशों से मूंछें बनाई जाती थीं और कद्दू व लचीली लकड़ी से चश्मे तैयार किए जाते थे।
जिनके दम पर जिंदा है परंपरा…
बचपन में होली में स्वांग करने वाली महिलाओं को देखकर शौक चढ़ा था। अब हर साल होली में अलग-अलग तरीके स्वांग रचाकर महिलाओं का मनोरंजन कर रही हूं। पहले के समय में कई महिलाएं एक साथ स्वांग करती थीं। अब बहुत कम महिलाएं इसमें रुचि लेती हैं।-पार्वती टंगड़िया, ज्वालादेवी वार्ड, बागेश्वर
होली पर्व पर सास-बहू, ननद-भाभी सब एक साथ होते हैं। पहले के समय में स्वांग मनोरंजन के साथ-साथ महिलाओं की झिझक को दूर करने में भी मददगार होते थे। स्वांग रचाने वाली महिलाएं अपने अभिनय से रिश्तों के बीच की मर्यादा को बनाए रखते हुए खुलकर होली मनाने में मध्यस्थता का काम करती थीं।-तारा तिवाड़ी, ठाकुरद्वारा वार्ड, बागेश्वर
घर, मोहल्ले या गांव में होने वाले प्रत्येक शुभ कार्यों में महिलाएं नाच-गाकर मनोरंजन करती हैं। स्वांग के कारण ही होली में हास्य का रंग घुलता है। नई पीढ़ी की महिलाएं स्वांग में कम रुचि दिखाती हैं, लेकिन परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए कोई न कोई आगे आ ही जाता है।-दुर्गा खोलिया, गरुड़
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