ठंड के मौसम में होती है गेहूं की बुवाई
कृषि विशेषज्ञ संजय यादव ने लोकल 18 को बताया कि गेहूं की बुवाई मुख्य रूप से ठंड के मौसम में की जाती है. यह मौसम फसल के अंकुरण और बढ़वार के लिए अनुकूल माना जाता है.
ये उन्नत किस्में देती हैं बेहतर उत्पादन
संजय यादव ने बताया कि सरबती, लोकवन, बीडब्ल्यू–303, एचडी–3086 और एचडी–3046 जैसी किस्में गेहूं की अच्छी किस्में हैं, जिनसे किसानों को बेहतर उत्पादन मिलता है. क्षेत्र में बोनी किस्म और ऊंची किस्म, दोनों प्रकार की खेती की जाती है, लेकिन अधिकांश किसान बोनी किस्म को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि इससे उत्पादन अधिक होता है.
खुले बाजार में 28 रुपये किलो तक भाव
संजय यादव के अनुसार गेहूं का बाजार भाव खुले बाजार में लगभग 28 रुपये प्रति किलो तक मिल रहा है. हालांकि, क्षेत्र में समर्थन मूल्य पर खरीदी नहीं हो रही है. जहां सिंचाई की अच्छी व्यवस्था है, वहां प्रति हेक्टेयर 30 से 35 क्विंटल तक उत्पादन संभव है.
गेहूं में लगने वाले प्रमुख रोग
कृषि एक्सपर्ट ने बताया कि गेहूं की शुरुआती अवस्था में एलोमोजेक या गिरवी रोग देखने को मिलता है, जो अधिक पानी भराव की स्थिति में होता है. वहीं, बालियां निकलते समय कंडुआ रोग का प्रकोप हो सकता है, जिसमें बालियां काली पड़ जाती हैं. यह फंगस जनित रोग है.
रोग नियंत्रण के उपाय
कृषि विशेषज्ञ ने बताया कि कंडुआ रोग की रोकथाम के लिए मेनकोजेब या कार्बेंडाजिम का छिड़काव प्रभावी माना जाता है. समय पर उपचार करने से फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है.
जैविक खाद से बढ़ेगी रोग प्रतिरोधक क्षमता
देसी और जैविक उपायों पर जोर देते हुए संजय यादव ने कहा कि गोबर खाद, कम्पोस्ट और वर्मी कम्पोस्ट जैसी जैविक खादों के उपयोग से फसल की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, जिससे रोग और कीटों का प्रभाव कम हो जाता है.
पाले से बचाव के तरीके
संजय ने बताया कि जब तापमान शून्य डिग्री के आसपास पहुंच जाता है, तब पाले का असर दिखाई देता है. जबकि 8 से 10 डिग्री सेल्सियस से ऊपर तापमान रहने पर पाले का प्रभाव नहीं होता. सिंचाई की सुविधा होने से पाले के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
खरपतवार नियंत्रण जरूरी
गेहूं की फसल में मुख्य रूप से चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार की समस्या देखी जाती है. इसके नियंत्रण के लिए ‘टू-फोडी’ नामक हर्बीसाइड का उपयोग करने की सलाह दी गई है.
ज्यादा मुनाफे के लिए ये अपनाएं
अधिक मुनाफा कमाने के लिए किसानों को उच्च उत्पादन देने वाली उन्नत किस्मों का चयन करना चाहिए. साथ ही जैविक खादों के साथ संतुलित मात्रा में एनपीके उर्वरकों का उपयोग करें, जिससे लागत कम होगी और बेहतर मुनाफा प्राप्त किया जा सकेगा.
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