Local 18 से बातचीत में योगेन्द्र बताते है कि उनका का रिश्ता संगीत से जन्म से ही जुड़ा रहा. उनके दादाजी अपने समय के बड़े म्यूजिक डायरेक्टर रहे. किशोर कुमार, आर.डी. बर्मन और आनंद बख्शी जैसे दिग्गजों के साथ उन्होंने काम किया. लेकिन एक दुखद हादसे में दादाजी का असमय निधन हो गया. उस वक्त योगेन्द्र के पिता महज 4–5 साल के थे. परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा.
पिता के अधूरे सपने को योगेंद्र ने किया पूरा
पिता का सपना भी सिंगर बनने का था, लेकिन उस दौर में हालात ऐसे नहीं थे कि वे संगीत को अपना करियर बना पाते. जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने पढ़ाई की, मेहनत की और एक बड़े इंजीनियर बने. देश के टॉप इंजीनियरों में उनका नाम रहा. कई बड़े और मुश्किल प्रोजेक्ट उन्होंने किए, जिसके लिए उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिला. लेकिन दिल के किसी कोने में संगीत का सपना आज भी जिंदा था. वही सपना उन्होंने अपने बेटे योगेन्द्र की आंखों में देख लिया.
शिव भजन गाकर हो गए लोकप्रिय
साल 2003 योगेन्द्र के जीवन में एक बड़ा मोड़ लेकर आया. उस समय गुलशन कुमार की टॉप म्यूजिक कंपनी से उन्होंने शिव नाम भजन गाया. यह भजन घर-घर पहुंचा और लाखों लोगों ने इसे सुना. यही वो मौका था जिसने योगेन्द्र को पहचान दिलाई और उनके करियर को नई दिशा दी. खंडवा के श्री दादाजी धूनीवाले पर गाए गए उनके कई भजन सुपरहिट हुए. प्यार दिया दादाजी महाराज और भर दो झोली मेरी जैसे भजनों पर 30 मिलियन से ज्यादा व्यू आए. लोगों का प्यार और आशीर्वाद उन्हें लगातार आगे बढ़ाता गया.
दिल आज भी खंडवा में बसता है
इस सफर में कई दिग्गज कलाकारों का उन्हें आशीर्वाद मिला. सोनू निगम, कैलाश खेर, उदित नारायण जैसे नामों के साथ काम करने का मौका मिला. भजन सम्राट अनूप जलोटा ने तो उन्हें अपना शिष्य बनाया और समय-समय पर मार्गदर्शन दिया. शंकर महादेवन जैसे महान सिंगर का भी उन्हें स्नेह और आशीर्वाद मिलता रहा.
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